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हरिद्वार

पत्र का परिचय

भारतेंदु हरिश्चंद्र का पत्र 'हरिद्वार' शुरू कीजिए और जानिए कि यह पाठ एक पत्र क्यों है।

एक पत्र. यह पाठ न कहानी है, न कविता; यह एक पत्र है। यह एक पत्रिका के संपादक को लिखा गया था, और उसमें छपा भी था।

पत्रिका का नाम है 'कविवचन सुधा', और तारीख़ है 14 अक्टूबर सन् 1871 ई.। यानी यह पत्र लगभग 150 साल पुराना है।

इसलिए ध्यान रखिए: इसकी हिंदी आज की हिंदी नहीं है। कुछ शब्द अलग हैं, वर्तनी (spelling) अलग है, वाक्यों की बनावट भी अलग है। यह भी इस पाठ की एक सीख है।

लेखक. पत्र के लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं, जो अपनी यात्राओं के लिए जाने जाते थे। उन्होंने भारत के बहुत-से गाँवों और नगरों की यात्रा की और उनके बारे में पत्र-पत्रिकाओं में लिखा।

यात्राओं से उन्हें प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और पुरातत्त्व (पुरानी चीज़ों का अध्ययन) समझने में बहुत मदद मिली।

उनका विश्वास: "वे मानते थे कि शिक्षा की पूर्ति पुस्तकों से ही नहीं यात्राओं से भी होती है।" ध्यान दीजिए: केवल यात्रा नहीं, किताबें भी और यात्रा भी।

हरिद्वार. 1871 ई. में वे हरिद्वार गए। वहाँ की प्रकृति, पर्वत, पक्षी, पेड़, कलकल बहती गंगा, घाट, लोग, दुकानें देखकर वे बहुत आनंदित हुए।

अपना अनुभव उन्होंने एक वाक्य में कहा: "मेरा तो चित्त (मन) वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।" यानी जो वर्णन कर रहा है, वही कह रहा है कि यह वर्णन से बाहर है!

'शिक्षा की पूर्ति पुस्तकों से ही नहीं यात्राओं से भी होती है': भारतेंदु का अपना विश्वास।

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