हरिद्वार
पर्वत और वृक्ष
पत्र में हरिद्वार के पर्वतों और वृक्षों का वर्णन पढ़िए।
संबोधन. पत्र शुरू होता है: "श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु!" यह उस समय की औपचारिक भाषा है, जिसमें आदर के कई शब्द एक साथ रखे जाते थे।
पहला वाक्य पत्र का भाव बता देता है: "मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है कि मैं उस पुण्य भूमि का वर्णन करता हूँ जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है।"
तुलना का ढंग. लेखक कोई दृश्य सीधे नहीं बताता; वह हर चीज़ की तुलना किसी और से करता है। हरिद्वार तीन ओर हरे-भरे पर्वतों से घिरा है।
लताएँ: पर्वतों पर फैली वल्ली (लताएँ, बेलें) "सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है"। जैसे भले लोगों की अच्छी इच्छाएँ चारों ओर फैलती हैं, वैसे ही ये लताएँ।
पेड़: बड़े-बड़े वृक्ष "मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम (धूप), ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।" पेड़ का एक ही तना होता है, इसलिए 'एक पैर से खड़े'; और तपस्वी भी एक पैर पर खड़े होकर तप करते हैं।
पेड़ क्या-क्या देते हैं: "फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोरथ पूर्ण करते हैं।" नौ चीज़ें, और जलने के बाद भी दो!
इसलिए: "इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी (माँगने वाले) विमुख (खाली हाथ) जाते ही नहीं।" और प्रसिद्ध वाक्य: "सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।" यानी भले लोग बुराई के बदले भी भलाई करते हैं, जैसे पेड़ पत्थर खाकर भी फल देता है।
पक्षी: रंग-बिरंगे पक्षी "नगर के दुष्ट बधिकों (शिकारियों) से निडर होकर कल्लोल करते हैं"। यहाँ उन्हें कोई डर नहीं।
हरियाली: वर्षा से फैली हरियाली ऐसी लगती है "मानो हरे गलीचे की जात्रियों (यात्रियों) के विश्राम के लिए बिछायत बिछी थी"। थके यात्रियों के लिए बिछा हरा क़ालीन!
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