कबीर के दोहे
सूप और मन पंछी
सूप और मन रूपी पंछी के बारे में कबीर के दोहे समझिए।
सातवाँ दोहा: "साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥"
'सूप' (पीने वाला सूप नहीं!) बाँस का बना छाज है, जिससे अनाज फटका जाता है। उसे हिलाने पर भारी, अच्छे दाने उसी में रह जाते हैं, और हल्का भूसा हवा में उड़ जाता है।
दो शब्द:
- 'सार' = काम की चीज़, असली तत्व;
- 'थोथा' = खोखला, बेकार।
सूप का स्वभाव है: सार को पकड़े रखना, थोथा उड़ा देना।
कबीर कहते हैं: साधु (यानी अच्छा इंसान) का स्वभाव भी ऐसा ही हो। यहाँ 'सूप' विवेक और सूझबूझ का प्रतीक है: अच्छे और बुरे की पहचान करने की क्षमता।
ध्यान दीजिए: सूप कुछ नष्ट नहीं करता; वह केवल अलग करता है। यही विवेक का काम है।
आठवाँ दोहा: "कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय। जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय॥"
पहली पंक्ति का चित्र: मन पंछी बन गया है, जहाँ चाहे उड़ जाता है। यानी मन को रोकना कठिन है; उसे काबू में रखना और सही दिशा में ले जाना ज़रूरी है।
दूसरी पंक्ति इतनी प्रसिद्ध है कि कहावत बन गई: 'जैसा संग वैसा रंग'। अच्छी संगति से अच्छा फल, बुरी संगति से बुरा।
कहावत वह वाक्य है, जिसमें जीवन का गहरा अनुभव सरल और छोटे रूप में कहा जाता है। लोग अपनी बात को असरदार बनाने के लिए कहावतें बोलते हैं।
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