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कबीर के दोहे

वाणी और निंदक

वाणी और निंदक के बारे में कबीर के दोहे पढ़िए।

पाँचवाँ दोहा वाणी के बारे में है: "ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय॥"

'आपा' = अहंकार, घमंड, खुद को बड़ा समझने का भाव। कबीर कहते हैं: बोलने से पहले उसे खो दीजिए। घमंड से हमारी वाणी कठोर हो जाती है।

फ़ायदा दोहरा है:

  • 'औरन को सीतल करै': सुनने वालों को शांति (ठंडक) मिलती है;
  • 'आपहुँ सीतल होय': बोलने वाले को भी शांति मिलती है।

दूसरा भाग ज़रूरी है। हम सोचते हैं कि मीठी वाणी से दूसरों का भला होता है। कबीर कहते हैं: सबसे बड़ा लाभ बोलने वाले को ही मिलता है: उसे मन की शांति मिलती है।

छठा दोहा सबसे चौंकाने वाला है: "निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निरमल करै सुभाय॥"

'निंदक' = जो आपकी कमियाँ बताता है, आलोचना करता है। 'नियरे' = निकट, पास। कबीर कहते हैं: उसे केवल पास मत रखिए, आँगन में उसके लिए कुटिया बनवा दीजिए!

यानी आलोचक को दूर भगाना नहीं, उसे हमेशा के लिए पास बसा लेना चाहिए।

क्यों? 'बिन पानी साबुन बिना, निरमल करै सुभाय।' जैसे पानी और साबुन कपड़े का मैल धोते हैं, वैसे ही निंदक आपके स्वभाव का मैल धो देता है, आपकी गलतियाँ बताकर। और इसके लिए कोई खर्च भी नहीं!

निंदक को दूर मत भगाइए: आँगन में उसके लिए कुटिया बनवा दीजिए।

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