कबीर के दोहे
गुरु और संतुलन
गुरु और संतुलन के बारे में कबीर के दोहे पढ़िए और समझिए।
तीसरा दोहा हिंदी के सबसे प्रसिद्ध दोहों में से है: "गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"
पहली पंक्ति एक मुश्किल खड़ी करती है: गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों सामने खड़े हैं। पहले किसके पैर छुऊँ?
प्रश्न आसान नहीं: ईश्वर से बड़ा कौन? फिर भी कबीर का उत्तर गुरु के पक्ष में जाता है।
कारण दोहे में ही है: "बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।" 'बलिहारी' = न्योछावर। मैं अपने गुरु पर न्योछावर हूँ, क्योंकि गोविंद तक पहुँचने का रास्ता उन्होंने ही बताया।
यानी गुरु न होते तो ईश्वर का पता ही न चलता। इस दोहे में गुरु का महत्व बताया गया है।
चौथा दोहा बिलकुल अलग विषय पर है: "अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥"
'अति' = बहुत अधिक, सीमा से बाहर। और यह शब्द चारों भागों के शुरू में आता है: अति, अति, अति, अति।
चार बातें हैं, जोड़ों में:
- बहुत बोलना और बिलकुल चुप रहना (मनुष्य से);
- बहुत वर्षा (बाढ़) और बहुत धूप (सूखा) (प्रकृति से)।
दोनों का संदेश एक है: हर चीज़ में संतुलन ज़रूरी है।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.