कबीर के दोहे
सत्य और खजूर
जानिए कि दोहा क्या होता है और कबीर के पहले दोहे पढ़िए।
दोहा क्या है? दोहा दो पंक्तियों का छंद है, और हर पंक्ति के भी दो-दो भाग होते हैं। इतने छोटे रूप में इतनी बड़ी बात कहना ही कबीर की खूबी है।
पहला दोहा: "साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप॥"
पहली पंक्ति में दो बातें हैं, जैसे तराज़ू के दो पलड़े: सच के बराबर कोई तप नहीं; झूठ के बराबर कोई पाप नहीं।
'तप' का अर्थ है कठिन साधना: भूखे रहना, वन में जाना, वर्षों ध्यान करना। कबीर कहते हैं: सच बोलना इन सबसे कम कठिन नहीं। सच बोलने से कई बार मुश्किल आती है, जबकि झूठ से तुरंत बच निकलते हैं; फिर भी झूठ के साथ पकड़े जाने का डर हमेशा बना रहता है।
दूसरी पंक्ति: "जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।" जिसके हृदय में सच है, उसी हृदय में गुरु (सही राह दिखाने वाला) खुद रहते हैं। यानी सच ही सबसे बड़ा मार्गदर्शक है।
दूसरा दोहा: "बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर॥"
खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है, पर उसके पत्ते केवल सिरे पर होते हैं। इसलिए नीचे से गुज़रने वाले पंथी (राहगीर) को छाया नहीं मिलती, और फल इतनी ऊँचाई पर लगते हैं कि हाथ नहीं आते।
सीख: केवल बड़ा या अमीर हो जाना काफ़ी नहीं। बड़ा होने के साथ उदार भी होना चाहिए, और दूसरों के काम आना चाहिए।
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