कबीर के दोहे
मेरी समझ से
कबीर के हर दोहे के बारे में अपनी समझ परखिए।
मेरी समझ से. सात प्रश्न हैं, हर दोहे के लिए एक। और एक बात खास ध्यान देने की है।
हर प्रश्न में चार विकल्प हैं, और अक्सर एक विकल्प दोहे का शाब्दिक अर्थ देता है। वह ठीक नहीं होता। यही सबसे बड़ा जाल है।
उदाहरण 1. 'अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप': एक विकल्प कहता है 'बारिश और धूप से बचना चाहिए'। यह शाब्दिक है। दोहा तो वर्षा और धूप का उदाहरण देकर संतुलन की बात कह रहा है।
उदाहरण 2. 'साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय': एक विकल्प है 'कठोर और क्रोधी स्वभाव का'। पर सूप कठोर नहीं होता; वह छाँटता है। सही उत्तर: विवेक और सूझबूझ।
उदाहरण 3. 'बड़ा हुआ तो क्या हुआ' किस जीवन-कौशल पर ज़ोर देता है? विकल्प: समय का सदुपयोग, दूसरों के काम आना, परिश्रम और लगन, सबके प्रति उदारता।
खजूर का दोष: वह छाया नहीं देता, उसके फल हाथ नहीं आते, यानी वह दूसरों के काम नहीं आता। उत्तर: 'दूसरों के काम आना', और 'सबके प्रति उदार रहना' भी इसी से जुड़ता है।
उदाहरण 4. 'साँच बराबर तप नहीं': दो उत्तर ठीक हैं:
- 'सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं' (पहली पंक्ति से);
- 'सत्य महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य है, जिससे हृदय प्रकाशित होता है' (दूसरी पंक्ति से)।
पर 'सत्य और झूठ में कोई अंतर नहीं' साफ़ गलत है: दोहा तो दोनों का भेद ही बता रहा है।
कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर हो सकते हैं। पूरा दोहा पढ़े बिना उत्तर चुनना ही ऐसी गलतियों का कारण है।
दूसरों के साथ व्यवहार से जुड़े दोहे: वाणी (ऐसी बानी बोलिए), निंदक, खजूर (दूसरों के काम आना), और संगति।
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