LearnWave
Learn it. Master it.

एक टोकरी भर मिट्टी

एक टोकरी भर मिट्टी

पढ़िए कि ज़मींदार साहब बुढ़िया की झोंपड़ी के पास क्या चाहते थे।

वृद्धा लौटी. एक दिन श्रीमान् उस झोंपड़ी के पास टहल रहे थे और लोगों को काम बता रहे थे (यानी अब वहाँ निर्माण की तैयारी थी)।

तभी वृद्धा हाथ में एक टोकरी लेकर वहाँ पहुँची। श्रीमान् ने देखते ही नौकरों से कहा: उसे यहाँ से हटा दो।

वह झगड़ी नहीं. वह गिड़गिड़ाकर बोली: "महाराज, अब तो झोंपड़ी तुम्हारी ही हो गई है। मैं उसे लेने नहीं आई हूँ।"

यह वाक्य ज़रूरी है। वह पहले ही साफ़ कर देती है कि वह अपना हक़ माँगने नहीं आई, इसीलिए ज़मींदार सुनने को तैयार हो जाता है।

विनती. जब से झोंपड़ी छूटी है, उसकी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। वह एक ही बात कहती है: 'अपने घर चल, वहीं रोटी खाऊँगी।' यह पोती का अपने घर से गहरा लगाव (प्रेम) दिखाता है।

उपाय. इसलिए वृद्धा ने सोचा: "इस झोंपड़ी में से एक टोकरी भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊँगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी।"

ज़मींदार ने आज्ञा दे दी।

सबसे कोमल दृश्य. "वृद्धा झोंपड़ी के भीतर गई। वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मरण हुआ और उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी।"

फिर: "अपने आंतरिक दुख को किसी तरह सँभाल कर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली।" वह रोती है, पर उसका काम नहीं रुकता।

'मैं उसे लेने नहीं आई हूँ': यही वाक्य ज़मींदार को सुनने के लिए तैयार करता है।

Practise this lesson

Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.

No account, no email address. Opens the real product.