एक टोकरी भर मिट्टी
टोकरी का भार
कहानी का सबसे बड़ा क्षण पढ़िए, जब बात एक टोकरी के भार पर आ जाती है।
छोटी-सी माँग. वृद्धा हाथ जोड़कर बोली: "महाराज, कृपा करके इस टोकरी को ज़रा हाथ लगाइए जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूँ!"
माँग बहुत छोटी है, इसीलिए मना करना कठिन है। ज़मींदार पहले नाराज़ हुए, पर जब वह बार-बार हाथ जोड़ने और पैरों पर गिरने लगी, तो उनके मन में कुछ दया आ गई।
पहला बदलाव. "किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वयं टोकरी उठाने को आगे बढ़े।"
अब तक उन्होंने हर काम नौकरों से कराया था, वृद्धा को हटाने का भी। पहली बार वे खुद कुछ करने आगे बढ़े। यहीं से उनके व्यवहार में बदलाव शुरू होता है।
टोकरी नहीं उठी. "उन्होंने अपनी सब ताकत लगाकर टोकरी को उठाना चाहा, पर जिस स्थान पर टोकरी रखी थी, वहाँ से वह एक हाथ भी ऊँची न हुई।" वे लज्जित होकर बोले: "नहीं, यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।"
वृद्धा की बात. तब वह वह बात कहती है जिसके लिए वह आई थी: "आपसे तो एक टोकरी भर मिट्टी उठाई नहीं जाती और इस झोंपड़ी में तो हज़ारों टोकरियाँ मिट्टी पड़ी है। उसका भार आप जन्म-भर कैसे उठा सकेंगे?"
सही निष्कर्ष: एक टोकरी इतनी भारी है, तो पूरी झोंपड़ी छीनने का भार (यानी उस अन्याय का बोझ) ज़मींदार जीवन-भर कैसे उठाएँगे?
ध्यान दीजिए: वह कहीं 'अन्याय' शब्द नहीं बोलती। वह टोकरी को प्रतीक बनाकर ज़मींदार को उसके अन्याय का अनुभव करा देती है। और अनुभव किसी भी उपदेश से ज़्यादा असर करता है।
अंत. "ज़मींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गए थे, पर वृद्धा के वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गईं।" (धन-मद से गर्वित = पैसे के घमंड में चूर।) "कृतकर्म का पश्चाताप कर उन्होंने वृद्धा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी वापस दे दी।" कहानी का अंत सुखद है: अन्याय पर न्याय की जीत।
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