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नए मेहमान

भाषा की बात

एकांकी की साधारण भाषा में छिपे खास प्रयोग पहचानिए।

इस एकांकी की भाषा सीधी-सादी है, पर उसमें तीन तरह के प्रयोग हैं जो उसे असरदार बनाते हैं।

1. शब्दों से खास असर. 'आग बरस रही हो', 'दीवारें तप रही हैं', 'भाड़ में भुनते रहते हैं'। ये सब गरमी की प्रचंडता (बहुत तेज़ गरमी) बताने के ढंग हैं, और 'बहुत गरमी है' से कहीं ज़्यादा असरदार। और भी: 'मकान है कि भट्टी!', 'जैसे साँस बंद हो जाएगी', 'प्राण सूखे जा रहे हैं'।

2. मुहावरे.

  • दिन-रात एक करना = बहुत परिश्रम करना;
  • खाक में मिलना = नष्ट हो जाना;
  • सिर फटना = बहुत तेज़ सिर-दर्द होना;
  • जान में जान आना = चैन मिलना।

3. बात पर ज़ोर देना ('ही'). 'वह तो कहो, मैं भी ढूँढ़कर ही रहा।' अब 'ही' हटा दीजिए: 'मैं भी ढूँढ़कर रहा।' अर्थ वही रहता है, पर ज़ोर चला जाता है।

'ही' की जगह बदलिए, अर्थ बदलता है. 'ही' जिस शब्द के बाद लगता है, उसी पर ज़ोर देता है:

  • 'विश्वनाथ के ही अतिथि यहाँ रुकेंगे' = और किसी के अतिथि नहीं;
  • 'विश्वनाथ के अतिथि यहीं रुकेंगे' = यहाँ के सिवा कहीं और नहीं;
  • 'विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रुकेंगे ही' = रुकना पक्का है।

'तो' भी ऐसा ही है: 'तुम नहाने तो जाओ', 'तुम तो नहाने जाओ', 'तुम नहाने जाओ तो': तीनों में अर्थ का रंग अलग है।

एक ही 'ही', तीन जगह, तीन अर्थ।

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