नए मेहमान
पंक्तियों के भाव
एकांकी की बोलचाल वाली पंक्तियों में छिपे भाव समझिए।
बोलचाल की भाषा. इस एकांकी के कई वाक्यों का अर्थ शब्दों से नहीं, प्रयोग से बनता है। एक-एक करके देखिए।
'लाखों के आदमी खाक में मिल गए': वे बहुत अमीर थे, पर अब उनके पास कुछ नहीं। 'खाक में मिलना' मुहावरा है: नष्ट हो जाना।
'धोती ऐसी चर्रा रही है, जैसे पुरानी हो': कपड़ा पसीने से भीगकर पुराने जैसा हो गया है। बाबूलाल बताते हैं कि धोती नौ रुपये में नई ली थी। गरमी नई धोती को भी पुराना बना देती है।
'माल-मसाला तो अंटी में है न?': यहाँ 'माल-मसाला' = धन, और 'अंटी' = धोती की वह जगह जो कमर में खोंसी जाती है। अर्थ: धनराशि सुरक्षित तो है न? नन्हेमल का उत्तर: 'नहीं, जेब में है, बंडी की जेब में।'
इसका महत्व: यह दिखाता है कि मेहमानों के पास पैसे थे। फिर भी वे होटल में न ठहरकर एक अनजान के घर टिक गए।
'खाने में क्या देर-दार है?': भोजन कब तक तैयार होगा? सुनने में विनम्र, पर असल में तकाज़ा (जल्दी करने को कहना)।
'पहले आत्मा फिर परमात्मा': पहले अपना ध्यान, फिर दूसरा काम। रेवती यह तब कहती हैं जब उनका सिर फट रहा है और उनसे खाना बनाने को कहा जा रहा है।
'चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं': भाड़ वह भट्टी है जिसमें चने भूने जाते हैं। अर्थ: लगातार कष्ट में जलते रहना।
गरमी की तेज़ी (प्रचंडता) दिखाने वाले वाक्य: 'सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो', 'चारों तरफ दीवारें तप रही हैं', 'चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं'।
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