आदमी का अनुपात
सृजन और कविता का सौंदर्य
कविता के ढाँचे पर अपनी रचना बनाइए और उसकी सुंदरता समझिए।
इस पाठ के सृजन-अभ्यास कविता के ढाँचे को ही काम में लेते हैं।
चित्र शृंखला. चित्रों की एक कड़ी बनाइए, इस क्रम में:
- आदमी, कमरा, घर;
- पड़ोसी क्षेत्र, नगर, देश;
- पृथ्वी, ब्रह्मांड।
हर चित्र में आकार का अनुपात दिखाइए, ताकि साफ़ दिखे कि आदमी कितना छोटा है।
रेखाचित्र, सीढ़ी या माइंड-मैप. इसी क्रम को किसी भी रूप में बनाइए, और हर स्तर पर कुछ बातें लिखिए: पास-पड़ोस की एक खास बात, नगर की कोई जगह, देश की विविधता।
फिर नीचे एक पंक्ति में उत्तर दीजिए: "मैं इस चित्र में कहाँ हूँ और क्यों?" यही प्रश्न पूरी कविता पूछ रही है, और यहाँ सीधे आपसे पूछा गया है।
बिना दीवार की दुनिया. 'एक कमरे में दो दुनिया रचाता है' पढ़कर ऐसी दुनिया का वर्णन कीजिए जिसमें कोई दीवार न हो। ध्यान रखिए: इसका अर्थ यह नहीं कि सब एक जैसे हो जाएँ। सब अलग रहें, अपनी-अपनी बोली, रंग और पसंद के साथ, बस भेद की दीवारें न हों।
कविता का सौंदर्य. तीन पंक्तियाँ देखिए: 'दीवारें उठाता है', 'स्वामी बताता है', 'दो दुनिया रचाता है'। पुस्तक कहती है: "ये सारी क्रियाएँ मनुष्य के लिए आई हैं।"
ब्रह्मांड कुछ नहीं करता, वह केवल है। पृथ्वी कुछ नहीं करती, वह केवल छोटी है। सारी क्रियाएँ मनुष्य की हैं: उठाना, बताना, रचाना, और तीनों अलगाव पैदा करने वाली क्रियाएँ हैं। यही कविता का सौंदर्य भी है और उसका व्यंग्य भी।
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