आदमी का अनुपात
इस पर भी आदमी
कविता का अगला भाग पढ़िए और सोचिए कि इतने बड़े संसार में आदमी कहाँ खड़ा है।
निष्कर्ष: "यह है अनुपात / आदमी का विराट से।" विराट = अत्यंत विशाल। यह वही नाप-जोख है जो पहले भाग ने दिखाई: आदमी कितना छोटा, संसार कितना बड़ा।
कविता यहाँ मुड़ती है: "इस पर भी आदमी…" 'इस पर भी' = यह सब जानते हुए भी। इतना छोटा होकर भी, आदमी क्या करता है?
पाँच भाव, पाँचों बुरे: "ईर्ष्या, अहं, स्वार्थ, घृणा, अविश्वास लीन।" लीन = डूबा हुआ। आदमी इन्हीं भावों में डूबा रहता है।
दीवारें: "संख्यातीत शंख सी दीवारें उठाता है।"
- संख्यातीत = जिसकी गिनती न हो सके;
- शंख = भारतीय संख्या प्रणाली में 100 पद्म की संख्या (एक के आगे सत्रह शून्य)।
यानी इतनी दीवारें कि गिनी न जा सकें। और ये ईंट-पत्थर की नहीं, भेद (अलगाव) की दीवारें हैं।
स्वामी बनना: "अपने को दूजे का स्वामी बताता है।" आदमी खुद को दूसरे का मालिक बताता है, चाहता है कि दूसरा उसकी मर्ज़ी से चले। जो खुद इतना छोटा है, वह दूसरों का मालिक बनना चाहता है। यह कविता का सबसे तीखा व्यंग्य है।
आख़िरी तीन पंक्तियाँ: "देशों की कौन कहे / एक कमरे में / दो दुनिया रचाता है।" देशों की तो बात ही छोड़िए; एक ही कमरे के दो लोग भी अपनी-अपनी अलग दुनिया बना लेते हैं।
कविता वहीं लौट आई जहाँ से चली थी: एक कमरे में दो व्यक्ति।
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