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गुरदयाल सिंह — सपनों के-से दिन

स्कूल, ओमा और दो तरह के अध्यापक

दोनों अध्यापकों के स्वभाव की तुलना करना।

दो सौ सवाल. हिसाब के मास्टर छुट्टियों में दो सौ सवाल देते। लेखक हिसाब लगाता: रोज़ दस करूँ तो बीस दिन; फिर लगता, पंद्रह भी करूँ तो चलेगा। पर दिन खेल में निकल जाते, और काम रह जाता।

ओमा: पिटाई सस्ता सौदा. कुछ साथी काम करने के बजाय पिटाई को 'सस्ता सौदा' मानते। उनका नेता था ओमा: बड़ा-सा सिर, जिससे वह सिर से टक्कर मारता ('रेल-बम्बा')।

स्कूल. स्कूल बहुत छोटा था: बस नौ कमरे। दो अध्यापक, दो उलटे स्वभाव:

  • पीटी मास्टर प्रीतमचंद: बेहद सख़्त; प्रार्थना में ज़रा हिले तो झपट पड़ते, 'खाल खींचने' की धमकी देते;
  • हेडमास्टर शर्मा जी: नरम; गुस्से में भी बस हल्की-सी चपत।

'शाबाश' एक तमगा. स्काउटिंग की परेड में कभी-कभार पीटी साहब 'शाबाश' कह देते, तो बच्चों को लगता जैसे फ़ौज के सारे तमगे (मेडल) मिल गए हों।

पुरानी किताबें. लेखक के घर में पढ़ाई में किसी की दिलचस्पी नहीं थी। हेडमास्टर हर साल एक बड़े लड़के की पुरानी किताबें ले आते; इसी से उसकी पढ़ाई चलती रही, नहीं तो तीसरी-चौथी में ही छूट जाती। पर नई कक्षा की नई किताबों की गंध उसे आज भी उदास कर देती है।

डर वाले पीटी मास्टर और नरम हेडमास्टर: बच्चों को डर से नहीं, शाबाश से हौसला मिलता।

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