कबीर — साखी
कबीर और साखी
मीठी वाणी, कस्तूरी-मृग और दीपक वाली साखियों का भाव समझाना।
कबीर. कबीर का जन्म 1398 में काशी में माना जाता है; वे गुरु रामानंद के शिष्य थे। वे पढ़े-लिखे नहीं थे; उन्होंने जो देखा और अनुभव किया, वही कहा। वे धर्म के दिखावे पर चोट करते थे और अनुभव के ज्ञान को किताबी ज्ञान से ऊपर रखते थे।
'साखी' का मतलब. 'साखी' शब्द 'साक्षी' से बना है, और साक्षी का मतलब है गवाह: जिसने खुद आँखों से देखा हो। कबीर की साखियाँ उस सच की गवाही हैं जिसे उन्होंने खुद जाना। साखी असल में दोहा छंद है।
पहली साखी: मीठी बोली. 'ऐसी बाँणी बोलिए, मन का आपा खोइ।' आपा यानी अहंकार। मन का घमंड छोड़कर ऐसी बात बोलो जिससे अपना तन-मन भी ठंडा (शांत) रहे और सुनने वाले को भी सुख मिले। गुस्से में बोले कड़वे शब्द दोनों को जलाते हैं।
दूसरी साखी: कस्तूरी वाला हिरन. कस्तूरी (मीठी खुशबू वाली चीज़) हिरन की अपनी नाभि में होती है, पर वह उस खुशबू को खोजता हुआ पूरे वन में भटकता है। वैसे ही राम (ईश्वर) हर इंसान के भीतर हैं, पर दुनिया उन्हें बाहर मंदिर-मस्जिद में ढूँढ़ती है।
तीसरी साखी: 'मैं' और ईश्वर. 'जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहि।' जब तक मन में 'मैं' (अहंकार) था, ईश्वर नहीं मिले। जब ज्ञान का दीपक दिखा, तो अहंकार का सारा अँधेरा मिट गया। जैसे एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहतीं, वैसे ही अहंकार और ईश्वर साथ नहीं रहते।
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