कबीर — साखी
जागना, विरह, निंदक और पोथी
बाकी पाँच साखियों के प्रतीकों का अर्थ बताना।
सुखिया और दुखिया. 'सुखिया सब संसार है, खायै अरू सोवै।' सारी दुनिया खा-पीकर सो जाती है और खुश है। पर 'दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै।' कबीर जागते हैं और रोते हैं, क्योंकि उन्हें ईश्वर से दूर होने का दुख है और लोगों को मोह-माया में डूबा देखकर पीड़ा। यहाँ सोना = अज्ञान, जागना = ज्ञान।
विरह का साँप. 'बिरह भुवंगम तन बसै।' भुवंगम यानी साँप। ईश्वर से बिछड़ने का दुख ऐसे साँप जैसा है जो शरीर में बस जाए; उस पर कोई मंत्र काम नहीं करता। ईश्वर से बिछड़ा प्रेमी जी नहीं पाता, और जी भी ले तो बौरा (पागल-सा) हो जाता है। यह ईश्वर से प्रेम की बात है, किसी इंसान से नहीं।
निंदक को पास रखो. 'निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ।' निंदक (जो हमारी कमियाँ बताए) को पास रखो, अपने आँगन में ही उसकी झोंपड़ी बनवा दो। क्योंकि वह बिना साबुन-पानी के हमारा स्वभाव धो देता है: उसकी बातें सुनकर हम अपनी गलतियाँ सुधारते हैं।
किताबें या प्रेम? 'पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।' मोटी-मोटी किताबें पढ़ते-पढ़ते दुनिया मर गई, पर कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बना। 'ऐकै अषिर पीव का': जो पीव (प्रिय, यानी ईश्वर) का एक अक्षर पढ़ ले, यानी सच्चा प्रेम समझ ले, वही पंडित है।
अपना घर जलाया. 'हम घर जाल्या आपणाँ, लिया मुराड़ा हाथि।' कबीर कहते हैं: मैंने हाथ में मुराड़ा (जलती लकड़ी, मशाल) लेकर अपना मोह-माया का घर जला दिया। अब जो मेरे साथ चलना चाहे, उसका घर भी जलाऊँगा। यानी जो ईश्वर की राह पर आना चाहे, उसे भी मोह छोड़ना होगा।
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