कबीर — साखी
कबीर की भाषा
कबीर की भाषा की विशेषताएँ बताना और शब्दों के प्रचलित रूप लिखना।
पंचमेल खिचड़ी. कबीर जगह-जगह घूमकर ज्ञान पाते थे, इसलिए उनकी भाषा में अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी और पंजाबी के शब्द मिलते हैं। जैसे खिचड़ी में कई चीज़ें मिली होती हैं, वैसे ही इस भाषा को 'पंचमेल खिचड़ी' कहते हैं। इसे सधुक्कड़ी (साधुओं की भाषा) भी कहते हैं।
साखी = दोहा. साखी असल में दोहा छंद है: हर पंक्ति में 13 और 11 मात्राओं पर विराम, यानी कुल 24 मात्राएँ।
आसान भाषा, गहरी बात. भाषा सरल और बोलचाल की है। रोज़ की चीज़ों से उदाहरण लेते हैं: हिरन, दीपक, साँप, साबुन-पानी। इससे बात आसानी से याद रहती है।
बोली के शब्द, आज के रूप.
- साबण = साबुन, पाँणी = पानी, आँगणि = आँगन;
- अषिर = अक्षर, पीव = प्रिय, नेड़ा = निकट (पास);
- बाँणी = वाणी, जाल्या = जलाया।
ध्यान दें: कबीर अक्सर 'न' को 'ण' बोलते हैं।
पुराने क्रिया-रूप. देख्या = देखा, मुवा = मरा, जालौं = जलाऊँ, होइ = हो।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.