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मीरा — पद

मीरा और पहला पद

पहले पद में मीरा की विनती और उसके उदाहरण समझाना।

मीरा. मीराबाई का जन्म 1503 में जोधपुर के चोकड़ी (कुड़की) गाँव में माना जाता है। बचपन में माँ चल बसीं; शादी के कुछ साल बाद पति, फिर पिता और ससुर भी। दुखों से घिरकर उन्होंने घर छोड़ा और कृष्ण (गिरधर गोपाल) की भक्ति में डूब गईं। उनके पद गुजरात से बंगाल तक गाए जाते हैं।

भक्ति का रंग. मीरा कृष्ण को अपना सब कुछ मानती हैं। वे उनसे विनती (दैन्य भाव) भी करती हैं, प्यार (माधुर्य भाव) भी, और कभी उलाहना (शिकायत) भी देती हैं। कबीर का ईश्वर निर्गुण (बिना रूप) है; मीरा का सगुण (रूप वाला): मोर-मुकुट वाले कृष्ण।

पहला पद: 'हरि आप हरो जन री भीर'. भीर यानी पीड़ा, दुख। मीरा कहती हैं: हे हरि, तुम अपने भक्तों की पीड़ा हरते हो। और तीन उदाहरण देती हैं:

  • द्रौपदी: भरी सभा में उसकी लाज बचाने के लिए तुमने उसका चीर (वस्त्र) बढ़ाया;
  • प्रह्लाद: भक्त के लिए तुमने नरसिंह (आधा मनुष्य, आधा शेर) रूप धरा। नरसिंह विष्णु (हरि) का अवतार है;
  • गजराज: पानी में मगरमच्छ ने हाथियों के राजा गजेंद्र का पैर पकड़ लिया, वह डूब रहा था; उसकी पुकार पर तुमने उसे बचाया। (यह गजेंद्र है, इंद्र का हाथी ऐरावत नहीं।)

'मेरी भी पीड़ा हरो'. अंत में मीरा कहती हैं: मैं तुम्हारी दासी हूँ, गिरधर; मेरी पीड़ा भी उसी तरह हर लो।

विनती में हक़. यह सिर्फ़ विनती नहीं, अपनापन भरा हक़ भी है: तुमने उनके लिए इतना किया, तो मेरे लिए क्यों नहीं?

द्रौपदी, प्रह्लाद और गजेंद्र को याद दिलाकर मीरा कहती हैं: अपनी दासी की पीड़ा भी हरो।

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