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प्रहलाद अग्रवाल — तीसरी कसम के शिल्पकार शैलेंद्र

शैलेंद्र और तीसरी कसम

'तीसरी कसम' को 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' क्यों कहा गया, समझाना।

लेखक. प्रहलाद अग्रवाल भारत की आज़ादी के साल, यानी 1947 में, मध्य प्रदेश के जबलपुर में पैदा हुए। वे हिंदी सिनेमा के इतिहास और फ़िल्म बनाने वालों पर लिखते हैं।

साहित्य से फ़िल्म. जब कोई फ़िल्मकार किसी अच्छी किताब या कहानी को ईमानदारी से परदे पर उतारता है, तो फ़िल्म यादगार बनती है।

राजकपूर का दौर. 'संगम' की भारी सफलता के बाद राजकपूर ने चार फ़िल्में घोषित कीं: 'मेरा नाम जोकर', 'अजन्ता', 'मैं और मेरा दोस्त', 'सत्यम् शिवम् सुंदरम्'। 'मेरा नाम जोकर' के एक भाग में ही छह साल लग गए। इसी बीच 1966 में शैलेंद्र की फ़िल्म 'तीसरी कसम' आई। ('तीसरी कसम' राजकपूर की नहीं, शैलेंद्र की फ़िल्म थी; राजकपूर उसमें अभिनेता थे।)

पहली और आख़िरी फ़िल्म. शैलेंद्र गीतकार थे; 'तीसरी कसम' उनकी बनाई पहली और अंतिम फ़िल्म थी। इसे राष्ट्रपति स्वर्णपदक, बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन का सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म पुरस्कार मिला, और मॉस्को फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भी यह पुरस्कृत हुई।

'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता'. सैल्यूलाइड वह पदार्थ है जिससे पुरानी फ़िल्मों की रील बनती थी। फ़िल्म ने फणीश्वरनाथ रेणु की मार्मिक कहानी को इतनी संवेदना से परदे पर उतारा कि इसे 'सैल्यूलाइड पर लिखी कविता' कहा गया: कैमरे से लिखी गई कविता।

शैलेंद्र की इकलौती फ़िल्म 'तीसरी कसम' इतनी संवेदनशील थी कि उसे सैल्यूलाइड पर लिखी कविता कहा गया।

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