निदा फ़ाज़ली — अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले
सब जीवों की धरती
दूसरों के दुख को अपना मानने वाली कथाओं का भाव बताना।
लेखक. निदा फ़ाज़ली (1938–2016) उर्दू के कवि थे; दिल्ली में पैदा हुए, बचपन ग्वालियर में बीता। वे सरल बोलचाल की भाषा में गहरी बात कहते हैं। यह अंश उनकी किताब 'तमाशा मेरे आगे' से है।
धरती किसकी? प्रकृति ने धरती सब जीवों के लिए बनाई: इंसान, पशु, पक्षी, नदी, पहाड़, समुद्र, सबके लिए। पर इंसान ने इसे अपनी जागीर (निजी ज़मीन) बना लिया।
सुलेमान और चींटियाँ. सुलेमान (बाइबिल में उनका नाम सोलोमन है, कुरआन में सुलेमान) एक बादशाह थे जो पशु-पक्षियों की भाषा जानते थे। एक बार अपनी फ़ौज के साथ जा रहे थे; चींटियाँ डरकर बोलीं: 'जल्दी बिलों में चलो, फ़ौज आ रही है।' सुलेमान रुक गए और बोले: घबराओ नहीं; मैं किसी को सताने नहीं आया, मुझमें तो सबके लिए मुहब्बत है। बदले में चींटियों ने उन्हें दुआ दी।
शेख अयाज़ के पिता. सिंधी के महाकवि शेख अयाज़ अपनी आत्मकथा में लिखते हैं: उनके पिता एक दिन कुएँ पर नहाकर घर आए और खाने बैठे। तभी उन्होंने अपनी बाँह पर एक काला च्योंटा (बड़ी चींटी) रेंगता देखा। वे खाना छोड़कर उठ गए: उनका कहना था कि उन्होंने एक जीव को उसके घर से दूर कर दिया है; अब उसे कुएँ पर उसके घर वापस छोड़कर आएँगे।
नूह और कुत्ता. पैग़ंबर नूह (असली नाम लशकर) के सामने एक घायल कुत्ता आया। उन्होंने उसे दुत्कार दिया। कुत्ते ने कहा: न मैं अपनी मर्ज़ी से कुत्ता हूँ, न तुम अपनी मर्ज़ी से इंसान; बनाने वाला तो सबका एक ही है। यह सुनकर नूह दुखी होकर बहुत समय तक (मुद्दत तक) रोते रहे। महाभारत में भी युधिष्ठिर का साथ आख़िर तक एक कुत्ते ने ही दिया था।
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