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मैथिलीशरण गुप्त — मनुष्यता

सुमृत्यु और उदार मनुष्य

सुमृत्यु और उदार व्यक्ति की पहचान बताना।

कवि. मैथिलीशरण गुप्त 1886 में झाँसी के पास चिरगाँव में पैदा हुए; जीते-जी 'राष्ट्रकवि' कहलाए। उनकी भाषा शुद्ध खड़ी बोली है। रचनाएँ: साकेत, यशोधरा, जयद्रथ वध।

मौत से मत डरो. कवि कहता है: सोच लो, हर इंसान को एक दिन मरना है; मौत से डरो मत। पर ऐसे मरो कि सब याद करें।

'सुमृत्यु' क्या है? सुमृत्यु यानी अच्छी, सार्थक मौत: ऐसी मौत कि लोग आपके अच्छे कामों के लिए आपको याद करें। 'हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए': अगर ऐसी मौत न हुई, तो जीना भी बेकार, मरना भी बेकार।

पशु और मनुष्य. 'वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे।' सिर्फ़ अपने लिए खाना-जीना पशु का स्वभाव है। मनुष्य वह है जो मनुष्य के लिए मरे, यानी दूसरों के लिए जिए। जो दूसरों के लिए जिया, वह मरकर भी अमर है।

उदार इंसान. जो उदार (बड़े दिल वाला) है:

  • उसकी कहानी सरस्वती (किताबें, ज्ञान) सुनाती है;
  • धरती उसकी आभारी रहती है;
  • उसका यश हमेशा गूँजता है;
  • सारी दुनिया उसे पूजती है।

उदार वह है जो पूरे संसार में अपनापन भर दे, जैसे 'वसुधैव कुटुंबकम्': सारी धरती एक परिवार।

सिर्फ़ अपने लिए जीना पशु-प्रवृत्ति है; दूसरों के लिए जीकर मरना ही सुमृत्यु है।

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