प्रेमचंद — बड़े भाई साहब
टाइम-टेबिल और घमंड पर उपदेश
भाई साहब के उपदेश और उसमें छिपे शिक्षा पर व्यंग्य को पहचानना।
टाइम-टेबिल. डाँट खाकर छोटा भाई रोता और टाइम-टेबिल बनाता: सुबह छह से रात ग्यारह तक हर विषय का समय, खेल का नाम तक नहीं। पर पहले ही दिन मैदान की हरियाली, हवा के झोंके, फ़ुटबॉल की उछल-कूद उसे खींच ले जाती, और टाइम-टेबिल धरा रह जाता।
पहला नतीजा. सालाना परीक्षा हुई। भाई साहब फ़ेल, छोटा भाई पास, और दरजे में प्रथम! अब दोनों में बस दो साल का फ़ासला रह गया। उसके मन में आया कि भाई साहब से पूछे: 'आपकी वह घोर तपस्या कहाँ गई?' पर वे इतने दुखी थे कि उसने कुछ नहीं कहा।
घमंड पर उपदेश. छोटे भाई पर भाई साहब का रौब कम होने लगा, तो उन्होंने लंबा भाषण दिया:
- घमंड बड़े-बड़ों का नहीं रहा: रावण, शैतान, शाहे-रूम का भी;
- एक बार अव्वल आ जाना तुक्का है, संयोग है; असली चीज़ है बुद्धि का विकास।
आगे की पढ़ाई का डर. फिर उन्होंने अपनी कक्षा का डरावना चित्र खींचा:
- इतिहास: आठ-आठ हेनरी, दर्जनों जेम्स और विलियम, सबके नाम और नंबर याद रखो;
- ज्यामिति: अक्षरों का क्रम ज़रा-सा उलटा, और सारे नंबर कट;
- निबंध: 'समय की पाबंदी' पर 'संक्षेप में' लिखो, पर चार पन्नों से कम नहीं!
व्यंग्य किस पर? यह सब प्रेमचंद का शिक्षा-व्यवस्था पर व्यंग्य है: जहाँ रटने को ही शिक्षा मान लिया गया, बच्चों पर अंग्रेज़ी और दूसरे देशों का इतिहास थोप दिया गया, और समझ की जगह याद करने पर ज़ोर है। 'संक्षेप में चार पन्ने' जैसी उलटी माँग इसी बेतुकेपन पर चोट है।
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