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अनुवाद / Translation

अनुवाद: परिचय और रोज़ का अनुवाद

अनुवाद की बुनियादी समझ बनाना।

इकाई आंबेडकर के कथन से खुलती है — जैसे पौधे को सिंचाई चाहिए, विचार को फैलाव चाहिए। अनुवाद दूसरों का 'दूसरापन' दूर करता है: महाश्वेता देवी ने लिखा कि हिंदी अनुवाद छपने के बाद ही वे पूरे भारत की लेखिका बनीं।

अनुवाद में बात कमोबेश वही रहती है, भाषा बदलती है; पहली भाषा मूल (स्रोत) भाषा, दूसरी लक्ष्य भाषा। केवल दूसरी लिपि में लिखना लिप्यांतरण है — जैसे वसवेश्वर (बसवण्णा) की कन्नड़ पंक्तियों का लिप्यांतरण और उनके गुजराती, हिंदी, अंग्रेज़ी अनुवाद। छोटी भाषा की कृति (अवार का 'मेरा दागिस्तान', संथाली रचनाएँ) का बड़ी भाषाओं में अनुवाद ज्ञान का जनतांत्रीकरण करता है।

आज अनुवाद हर जगह है: पैकेट पर कई भाषाओं में जानकारी, पर्यटकों की गाइडबुक, एक ही विज्ञापन कई भाषाओं में, और सिंडीकेटेड कॉलम जो एक भाषा में लिखा जाकर कई भाषाओं में छपता है।

अनुवादक को कम से कम दो भाषाएँ — स्रोत और लक्ष्य दोनों — अच्छी तरह आनी चाहिए; पर शब्दकोश से शब्द बदल देना अनुवाद नहीं, उसमें संवेदनशीलता और समानुभूति चाहिए। दुभाषिया बोलकर तुरंत अनुवाद करता है; लिखित अनुवाद के लिए दोनों भाषाओं के समाज और साहित्य का ज्ञान ज़रूरी है।

संदर्भ से शब्द बदलते हैं: झुँझलाहट में 'ज़रूरत नहीं है मुझे वहाँ जाने की'; 'bouquet of flowers' के लिए 'फूलों का गुलदस्ता', पर 'flower competition' के लिए 'पुष्प-प्रतियोगिता'; आसमान में 'पखेरू', पानी में 'पक्षी'। हम रोज़ अनुवाद करते हैं — 'मास्टर ब्लास्टर' को 'सचिन' कहना, स्टेशन की अंग्रेज़ी घोषणा किसी को हिंदी में बताना।

अनुवाद — बात वही, भाषा नयी।

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