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कैमरा

कैमरे का खेल

कविता में कैमरे का मज़ेदार खेल समझो।

अपनी किताब 'वीणा' का पृष्ठ 116 खोलो और कविता 'कैमरा' फिर से पढ़ो। इस पाठ में हम देखेंगे कि कविता कैमरे के बारे में क्या-क्या बताती है।

कविता में, छोटू सोचता है कि कैमरे के अंदर कोई पेंटर छिपा होगा जो चित्र बनाता है। पर चाचा हँसकर समझाते हैं कि कैमरे में कोई पेंटर नहीं है — यह प्रकाश और छाया का खेल है। रोशनी और छाया के मेल से ही सुंदर चित्र बनता है।

कविता में कैमरे की खूबियाँ: बस एक क्लिक करो, और चित्र खिंच आता है — फूलों की फुलवारी का, कोयल, कौए या गौरैया का, दादी, अम्मा और बड़े भैया का। चीज़ जैसी है — अच्छी या बुरी — चित्र बिलकुल वैसा ही आता है। जैसी शक्ल, वैसा ही चित्र: हू-ब-हू। 'हू-ब-हू' का मतलब है बिलकुल वैसा का वैसा। इसे लिखते समय तीनों जगह बड़ा ऊ और बीच में 'ब' — हू-ब-हू।

किताब के पृष्ठ 119 पर कविता के आधार पर खाली जगहें भरनी हैं। कविता में चाचा घर में पूरा आने से पहले, दरवाज़े से ही छोटू को पुकारते हैं — यहाँ 'ही' ठीक है, क्योंकि बात यह है कि वे दरवाज़े पर पहुँचते ही चिल्ला पड़े। चाचा छोटू को अपने पास बैठने को कहते हैं — पास की जगह के लिए 'यहाँ' आता है, दूर के लिए 'वहाँ'।

किताब के दो और वाक्य: 'कोयल मीठा गाती है।' (कौआ मीठा नहीं गाता, वह काँव-काँव करता है।) और 'कैमरे ने हू-ब-हू चित्र खींचा।'

कविता के अनुसार कैमरे में कोई पेंटर नहीं छिपा; यह प्रकाश-छाया का खेल है, और क्लिक करते ही जैसी शक्ल हो, वैसा ही हू-ब-हू चित्र आ जाता है।

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