कविता का कमाल
लोककथा: मदन की कविता
लोककथा 'कविता का कमाल' पढ़ो और मदन और उसकी कविता से मिलो।
यह कहानी आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 11 'कविता का कमाल' की है। यह छत्तीसगढ़ की एक लोककथा है — यानी ऐसी कहानी जो लोग बहुत पहले से एक-दूसरे को सुनाते आए हैं। इसे यहाँ छोटे में पढ़ो।
बहुत पहले एक गाँव में मदन नाम का लड़का अपनी माँ के साथ रहता था। दोनों बहुत गरीब थे; घर में कमाई का कोई साधन नहीं था। फिर भी मदन सारा दिन खेल-कूद में बिता देता था। एक दिन माँ परेशान होकर बोलीं कि अब मैं तुझे बैठे-बैठे नहीं खिला सकती — जा, कुछ पैसे कमाकर ला।
मदन घर से निकल पड़ा और सोचने लगा कि पैसे कैसे कमाए। तभी उसे ढिंढोरा पीटने की आवाज़ सुनाई दी — ढोल बजाकर कोई ज़ोर से खबर सुना रहा था: राजदरबार में कवि-सम्मेलन हो रहा है, और जो सबसे अच्छी कविता सुनाएगा उसे इनाम में सौ अशर्फियाँ (सोने के सिक्के) मिलेंगी! मदन सीधा राजमहल की ओर चल पड़ा, हालाँकि उसने कभी कोई कविता नहीं बनाई थी। उसने सोचा — रास्ते में कुछ न कुछ सूझ ही जाएगा।
रास्ते में उसने जो देखा, उसी से कविता की पंक्तियाँ बनाता गया। पंजों से ज़मीन खोदते कुत्ते को देखकर उसने एक पंक्ति बनाई जो पूछती है कि 'खुदुर-खुदुर' क्या खोद रहे हो। तालाब पर पानी पीती भैंस को देखकर पंक्ति बनी कि 'सुरुर-सुरुर' क्या पी रही हो। पत्तियों के बीच से झाँकती चिड़िया को देखकर पंक्ति बनी कि 'ताक-झाँक' करके क्या खोज रही हो। फिर अपने-आप एक पंक्ति सूझी कि हम जानते हैं तुम क्या ढूँढ़ रहे हो। मदन के मन में लड्डू फूटने लगे! फिर रेंगते साँप को देखकर उसने तीन पंक्तियाँ और बनाईं: 'सरक-सरक' कहाँ भाग रहे हो, हम तुम्हें देख रहे हैं, और तुम हमसे बच नहीं सकते।
अब बस आखिरी पंक्ति बाकी थी। राजधानी पहुँचकर मदन ने एक आदमी से राजमहल का रास्ता पूछा। वह बोला — मुझे नहीं पता होगा तो और किसे पता होगा! उसने मदन को राजमहल का रास्ता बता दिया। मदन ने सोचा कि यह ज़रूर राजमहल का कोई कर्मचारी है, और उसका नाम पूछा। जवाब मिला: धन्नू शाह। मदन को तुरंत आखिरी पंक्ति सूझ गई — उसी नाम को पुकारती हुई: धन्नू शाह, भाई धन्नू शाह! इस तरह आठ पंक्तियों की कविता तैयार हो गई।
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