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कविता का कमाल

कविता ने ख़ज़ाना बचाया

जानो कि मदन की कविता ने ख़ज़ाना कैसे बचाया।

आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 11 'कविता का कमाल' में मदन अपनी आठ पंक्तियों की कविता लेकर राजमहल पहुँचा। अब आगे की कहानी पढ़ो।

राजदरबार में कवि-सम्मेलन चल रहा था। बारी आने पर मदन ने भी अपनी कविता सुनाई। सुनने वाले हैरान होकर एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे — इस अजीब कविता का मतलब क्या है? पर राजा के सामने कोई भी मूर्ख नहीं दिखना चाहता था, इसलिए किसी ने नहीं माना कि उसे कविता समझ नहीं आई।

उस रात राजा को नींद नहीं आई। मदन की कविता उनके दिमाग में घूम रही थी। वे छज्जे (बालकनी) पर खड़े होकर ज़ोर-ज़ोर से कविता दोहराने लगे, जैसे कोई पहेली बूझ रहे हों। उसी समय कुछ चोर राजा के खज़ाने में सेंध लगा रहे थे, यानी दीवार में छेद करके घुस रहे थे। उनमें एक वही धन्नू शाह था, जिसने दिन में मदन को राजमहल का रास्ता बताया था!

राजा ने खोदने वाली पंक्ति बोली, तो चोर चौंककर रुक गए — क्या राजा ने उन्हें खोदते देख लिया? डर से उनका गला सूख गया, और धन्नू शाह ने पानी का घूँट पिया। उसी समय राजा ने पीने वाली पंक्ति बोली! चोर सहमकर इधर-उधर झाँकने लगे, तो राजा ने झाँकने वाली पंक्ति बोली। चोर दबे पाँव सरकने लगे, तो राजा बोले कि सरक-सरक कहाँ भाग रहे हो, हम देख रहे हैं, बच नहीं सकते — और आखिर में धन्नू शाह का नाम!

धन्नू शाह को लगा कि अब कोई रास्ता नहीं बचा। उसने दौड़कर राजा के पैर पकड़ लिए और माफ़ी माँगी: अब कभी ऐसा काम नहीं करूँगा, हमने कुछ लिया भी नहीं, आपका खज़ाना सही-सलामत है। राजा हक्के-बक्के रह गए। सिपाहियों ने जाँच की तो पता चला कि खज़ाना लुटते-लुटते बचा था। राजा ने मदन को बुलाकर कहा — यह सब तुम्हारी कविता का कमाल है! मदन को सोने-चाँदी से मालामाल कर दिया गया, और वह खुशी-खुशी गाँव लौट आया। अब उसके पास अपने और माँ के खाने-पीने के लिए पूरा धन था।

रात को राजा छज्जे पर मदन की कविता दोहरा रहे थे; खज़ाने में सेंध लगा रहे चोरों को, जिनमें धन्नू शाह भी था, लगा कि राजा उन्हें देख रहे हैं; धन्नू शाह ने माफ़ी माँगी, खज़ाना बच गया और मदन को सोना-चाँदी मिला।

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