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शतरंज में मात

तेनाली की युक्ति

पढ़ो कि तेनाली ने कौन-सी चतुर युक्ति अपनाई।

यह आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 12 के नाटक 'शतरंज में मात' का तीसरा दृश्य है। शतरंज में हारने पर राजा ने आदेश दिया था कि भरी सभा में तेनालीरामन का मुंडन होगा। अब देखो, तेनाली ने इस दंड से बचने के लिए क्या चाल चली।

दरबार में नाई उस्तरा लेकर तैयार है और तेनाली मंच पर चढ़ चुके हैं। तेनाली राजा से एक निवेदन करते हैं: महाराज, इन बालों पर मैंने पाँच हज़ार अशर्फियाँ (सोने के सिक्के) उधार ली हैं। जब तक यह उधार (ऋण) न चुका दूँ, मुझे बाल कटवाने का कोई अधिकार नहीं है। दरबारी कहते हैं — देखा, कैसी चालाकी!

राजा थोड़ा सोचते हैं। वे एक दरबारी से कहते हैं कि अभी कोष (खज़ाने) से पाँच हज़ार अशर्फियाँ निकालकर तेनाली के घर भिजवाओ। फिर वे नाई से कहते हैं — अब काम पूरा करो, एक भी बाल न छूटे। यानी दंड अभी भी वापस नहीं हुआ!

तब तेनाली आँखें मूँदकर मंत्र बोलने लगते हैं। राजा पूछते हैं कि यह क्या है। तेनाली शांति से समझाते हैं: हमारे यहाँ माता-पिता के स्वर्ग सिधारने (मरने) पर ही मुंडन होता है। मेरे माता-पिता तो नहीं रहे, पर महाराज, अब आप ही मेरे माता-पिता हैं। अगर मेरा मुंडन हो गया, तो आप पर विपत्ति आ सकती है! यह सुनकर राजा घबरा जाते हैं और नाई को रोक देते हैं। वे दंड वापस ले लेते हैं।

अंत में राजा मुस्कुराकर कहते हैं — तुमसे कौन जीत सकता है? अशर्फियाँ भी ले लीं और दंड से भी बच गए! राजा तेनाली की चतुराई से फिर खुश हो जाते हैं और उन्हें साथ लेकर बाग में घूमने चले जाते हैं। दरबारी सिर पकड़ लेते हैं — तेनाली की बुद्धि ने उन्हें फिर मात दे दी।

नाटक में तेनाली ने दो चालें चलीं: पहले कहा कि बालों पर पाँच हज़ार अशर्फियाँ उधार हैं (राजा ने अशर्फियाँ उनके घर भिजवा दीं), फिर कहा कि मुंडन माता-पिता के स्वर्ग सिधारने पर ही होता है और अब राजा ही उनके माता-पिता हैं — डरकर राजा ने दंड वापस ले लिया।

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