शतरंज में मात
संवाद के भाव
समझो कि संवाद के साथ कोष्ठक में लिखे शब्द क्या बताते हैं।
नाटक में पात्र के संवाद के साथ कई बार कोष्ठक ( ) में एक शब्द लिखा होता है। वह बताता है कि पात्र यह बात किस मनोभाव (मन की भावना) से बोल रहा है — खुश होकर, गुस्से में, हैरान होकर या डरकर। आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 12 के नाटक 'शतरंज में मात' में ऐसे बहुत-से भाव हैं।
किताब के दो उदाहरण: जब राजा पूछते हैं कि तुमने बताया क्यों नहीं कि तुम शतरंज में माहिर हो, तो तेनाली (चकित) होकर कहते हैं — 'शतरंज और मैं!' चकित यानी हैरान। और राजा (क्रोधित) होकर कहते हैं — 'मुझे सब पता है तेनाली।' क्रोधित यानी गुस्से में।
नाटक के और भाव: तेनाली (घबराकर) कहते हैं कि उन्हें सचमुच शतरंज का ज्ञान नहीं है — घबराकर यानी डरकर, बेचैन होकर। राजा (प्रसन्न होकर) कहते हैं — 'क्या उत्तम सुझाव है!' प्रसन्न यानी खुश। तीसरे दृश्य में तेनाली आँखें खोलकर (शांति से) समझाते हैं — शांत यानी बिना गुस्से और बिना घबराहट के, आराम से।
किताब प्रसन्न भाव का एक और संवाद देती है: 'मेरी खोई हुई पुस्तक मिल गई है!' इसमें खुशी है। अगर कोई कहे, 'मेरी पुस्तक खो गई, अब मैं क्या करूँ?' — तो उसमें दुख है; वह दुखी मनोभाव है। संवाद पढ़कर सोचो: बोलने वाला खुश है, हैरान है, गुस्से में है, डरा है, शांत है या दुखी?
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.