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बगीचे का घोंघा

कहानी: बगीचे का घोंघा

कहानी 'बगीचे का घोंघा' पढ़ो और एक जिज्ञासु घोंघे से मिलो।

यह कहानी तुम्हारी किताब 'वीणा' के पाठ 2 'बगीचे का घोंघा' की है (पृष्ठ 18 से 20)। इसे यहाँ छोटे में पढ़ो।

बहुत समय पहले एक बगीचे में एक घोंघा रहता था। बगीचा बहुत छोटा और सुंदर था। घोंघे ने अपना सारा जीवन उसी बगीचे में बिताया था। घोंघा बहुत धीरे-धीरे चलता है, इसलिए उसे बगीचे के एक छोर (किनारे) से दूसरे छोर तक पहुँचने में पूरे दो दिन लग जाते थे। इतने लंबे समय से वहाँ रहने के कारण वह बगीचे का कोना-कोना पहचानता था।

पर कभी-कभी घोंघा सोचता था — इस बगीचे के बाहर क्या होगा? बाहर की दुनिया कैसी होगी? बगीचे की दीवार में एक छेद था। घोंघा रोज़ उस छेद को देखता था। उसे याद आता था कि उसकी माँ कहा करती थीं — वहाँ कभी मत जाना, वह दुनिया हमारी दुनिया से बहुत अलग है।

घोंघा कुछ दिन और सोचता रहा। फिर उसने तय कर लिया कि वह बाहर जाकर देखेगा कि दुनिया कैसी है। उसने अपना सामान अपने शंख (पीठ पर के कड़े खोल) में बाँध लिया। अगले दिन सूरज निकलने से पहले ही वह चल पड़ा और बगीचे को पीछे छोड़ दिया। वह दीवार के छेद में घुसा और जल्दी ही बाहर निकल आया। बाहर आते ही वह चकित रह गया!

बाहर उसने बहुत-सी नई चीज़ें देखीं — एक बड़ा मैदान, लाल चींटियाँ, आसमान छूता खजूर का पेड़ और एक बहुत बड़ा बड़ का पेड़। उसे बाहर की दुनिया इतनी अद्भुत लगी कि उसने तय किया कि अब वह इसी दुनिया में रहेगा।

कहानी में घोंघा छोटे-से सुंदर बगीचे में रहता था; माँ के मना करने पर भी वह बाहर की दुनिया देखने के लिए अपना सामान शंख में बाँधकर, सूरज निकलने से पहले, दीवार के छेद से बाहर निकल गया।

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