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बगीचे का घोंघा

वाह! कब कहा?

जानो कि घोंघा कब और क्यों 'वाह' कह उठा।

तुम्हारी किताब 'वीणा' के पाठ 2 'बगीचे का घोंघा' में घोंघा बाहर की दुनिया देखकर चार बार 'वाह!' कहता है। हर बार वह दुनिया के बारे में एक नई बात कहता है। किताब के पृष्ठ 24 पर इन बातों को उस घटना से मिलाना है, जब घोंघे ने उन्हें कहा।

पहली बार: छेद से बाहर आकर घोंघे ने बच्चों के खेलने का बहुत बड़ा, लंबा-चौड़ा मैदान देखा। उसने सोचा ही नहीं था कि इतनी बड़ी जगह भी हो सकती है। तब उसने कहा — वाह! दुनिया सचमुच कितनी बड़ी है।

दूसरी बार: खड़-खड़ की आवाज़ के साथ एक सूखा पत्ता उसके ऊपर आ गिरा। पहले तो वह डर गया, फिर अपने ऊपर हँसने लगा और बोला — वाह! दुनिया तो कितनी मज़ेदार है।

तीसरी बार: उसने देखा कि एक गेंद लुढ़कती जा रही है और एक कुत्ता उसके पीछे भाग रहा है। तब उसने कहा — वाह! दुनिया में सब कुछ कितनी तेज़ी से चलता है। उसे याद आया कि बगीचे में तो सब कुछ धीरे-धीरे चलता था।

चौथी बार: उसने बड़ का इतना बड़ा पेड़ देखा कि उसका एक छोर से दूसरा छोर भी नहीं दिखता था। तब उसने कहा — वाह, सचमुच दुनिया कितनी अद्भुत है! याद रखने का आसान तरीका: मैदान — बड़ी, सूखा पत्ता — मज़ेदार, कुत्ता और गेंद — तेज़, बड़ का पेड़ — अद्भुत।

कहानी में घोंघे ने मैदान देखकर दुनिया को 'बड़ी', सूखा पत्ता गिरने पर 'मज़ेदार', गेंद के पीछे भागता कुत्ता देखकर 'तेज़' और बड़ का पेड़ देखकर 'अद्भुत' कहा।

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