नीम
कविता: नीम
कविता 'नीम' पढ़ो और नीम के पेड़ के बारे में जानो।
अपनी किताब 'वीणा' का पृष्ठ 27 खोलो और पाठ 3 की कविता 'नीम' पढ़ो। यह कविता हरीश निगम ने लिखी है। इसमें नीम के पेड़ की बहुत-सी अच्छाइयाँ (गुण) बताई गई हैं — जैसे नीम कोई प्यारा, हँसमुख दोस्त हो।
कविता कहती है कि नीम हवा में लहराता और बलखाता (झुकता-मुड़ता) रहता है, और दिनभर हँसता-गाता है — यानी दिनभर खुश रहता है। चिड़िया, कौआ और तोता — इन सब पक्षियों से वह अपना नेह जताता है। 'नेह' का अर्थ है प्यार और स्नेह। नीम पक्षियों को अपनी डालियों पर बैठने और रहने देता है।
कविता में यह भी कहा गया है कि नीम डॉक्टर नहीं है, फिर भी कितने ही रोग भगाता है। और जब कभी प्रदूषित (गंदी) हवा चलती है, तो नीम उसे शुद्ध यानी साफ़ बना देता है।
नीम का स्वाद कड़वा होता है। कविता कहती है कि कड़वे तन में भी मन को मीठा रखना — यह बात नीम हमें सिखाता है। यानी बाहर से कैसे भी हों, मन से मीठे और अच्छे बने रहो।
जब हवा चलती है, तो नीम झूम-झूमकर सबका मन बहलाता है — यानी सबका मन खुश कर देता है। और आखिरी बात: नीम किसी से कुछ भी नहीं लेता, फिर भी हमें कितना कुछ दे जाता है।
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