हमारा आहार
हाँ जी हाँ, ना जी ना
कविता में 'हाँ जी हाँ' और 'ना जी ना' वाली बातें समझो।
अपनी किताब 'वीणा' का पृष्ठ 40 खोलो और कविता 'हमारा आहार' फिर से पढ़ो। कविता की हर बात दो हिस्सों में है: पहला हिस्सा कोई बात शुरू करता है, और दूसरा हिस्सा उसे पूरा करता है। किताब के पृष्ठ 44 पर इन दोनों हिस्सों को मिलाना है।
जैसे: जब कोई पेट से ज़्यादा खाता है — तो वह खाकर बाद में पछताता है (यह जोड़ी किताब ने खुद मिलाकर दिखाई है)। खरबूज, तरबूज, ककड़ी, खीरा — ये गरमी की पीड़ा हरते हैं। भोजन में खूब सलाद हो — उसका अपना ही मज़ा (अंदाज़) है। जब हम ढंग से खाना खाते हैं — तो व्याधि (बीमारी) को आने का बहाना नहीं मिलता। और हमारा आहार ऐसा हो — कि खाकर हम बीमार न पड़ें।
पृष्ठ 45 पर एक मज़ेदार खेल है। कविता की कुछ बातें बदलकर लिखी गई हैं। अगर बदली हुई बात कविता से मेल खाती है, तो कहो 'हाँ जी हाँ'; अगर कविता के उलटी है, तो कहो 'ना जी ना'।
कोई कहे — मेरे लिए बस आलू ही लाना, मुझे केवल आलू खाना है। कविता तो कहती है कि केवल आलू मत लाना, इसलिए उत्तर है: ना जी ना, ना जी ना (यह किताब ने खुद भरा है)। कोई कहे — दूध-दही मन भरकर खाना और हरी सब्ज़ियाँ मत भूलना: यह कविता से मेल खाता है — हाँ जी हाँ।
कोई कहे — खरबूज, तरबूज, ककड़ी, खीरा खाने से पीड़ा होती है: कविता तो कहती है कि ये पीड़ा हरते हैं — ना जी ना। कोई कहे — हमेशा ताज़ा खाना खाओ और रोग को दूर भगाओ: यह कविता की बात से मेल खाता है — हाँ जी हाँ।
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