हमारा आहार
कविता: हमारा आहार
कविता 'हमारा आहार' पढ़ो और अच्छे खाने के बारे में जानो।
अपनी किताब 'वीणा' का पृष्ठ 40 खोलो और पाठ 4 की कविता 'हमारा आहार' पढ़ो। 'आहार' का अर्थ है भोजन — जो कुछ हम खाते-पीते हैं। यह कविता बिहार की एक किताब 'कोंपल' से ली गई है। इसमें सब मिलकर सोचते हैं कि हमारा आहार कैसा होना चाहिए।
कविता कहती है कि चावल, दाल और सब्ज़ी खाओ, इससे तन में चुस्ती-फुर्ती आती है। सिर्फ़ आलू ही मत लाओ — भिंडी, परवल और नेनुआ भी खाओ। (नेनुआ एक हरी सब्ज़ी है, जिसे कई जगह तोरई कहते हैं।) दूध-दही छककर, यानी मन भरकर खाओ, और फल-फूलों के बाग लगाओ।
फलों में आम, अमरूद, पपीता खाओ, और केला व बेल भी घर ले आओ। कविता कहती है कि खरबूज, तरबूज, ककड़ी और खीरा गरमी की पीड़ा (तकलीफ़) हर लेते हैं, यानी दूर कर देते हैं। पानी खूब पियो — कविता कहती है कि पानी की महिमा अपरंपार है, यानी उसके गुणों का कोई अंत नहीं। भोजन में खूब सलाद हो — मूली, टमाटर, गाजर — और पालक को भी मत भूलो।
कविता में भूँजा और सत्तू नियमित रूप से, यानी रोज़-रोज़ खाने की बात है। (भूँजा भुने हुए अनाज को कहते हैं, और सत्तू भुने चने या जौ का आटा है।) कविता कहती है कि ऐसा करने से वैद्य-हकीम (पुराने समय के डॉक्टर) घर नहीं आते।
आखिर में कविता तीन बातें याद दिलाती है: जो पेट से ज़्यादा खाता है, वह बाद में पछताता है; हमेशा ताज़ा खाना खाओ, कोई बहाना मत बनाओ; और जब हम ढंग से खाना खाते हैं, तो व्याधि (बीमारी) को आने का बहाना नहीं मिलता। हमारा आहार ऐसा हो कि हम बीमार न पड़ें।
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