आसमान गिरा
सच क्या था?
जानो कि असल में सच क्या था।
यह आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 5 'आसमान गिरा' का दूसरा हिस्सा है। डरा हुआ खरगोश भागा, और उसकी बात सुनकर लोमड़ी, भालू और हाथी भी भागने लगे। फिर शेर ने सबको दहाड़कर रोक दिया।
शेर ने पूछा कि किसने कहा कि आसमान गिर रहा है। हाथी बोला — मुझसे भालू ने कहा। भालू बोला — मुझसे तो लोमड़ी ने कहा। लोमड़ी बोली — मुझसे खरगोश ने कहा; सबसे पहले इसी ने कहा था। खरगोश चुप रहा। शेर ने उससे पूछा कि आसमान कहाँ गिर रहा है। खरगोश ने बताया कि वह पेड़ के नीचे सो रहा था, और वहीं धम्म से आसमान गिरा। शेर बोला — चलो, चलकर देखें।
सब जानवर उस पेड़ के नीचे पहुँचे। वहाँ ज़मीन पर एक बड़ा-सा फल गिरा पड़ा था। तभी पेड़ से वैसा ही एक और फल गिरा — धम्म! खरगोश फिर चौंक गया। अब सच सबके सामने था: धम्म की आवाज़ पेड़ से गिरे फल की थी, आसमान तो गिरा ही नहीं था!
शेर ने मज़ाक किया — तो यही तुम्हारा आसमान था! लो, फिर आसमान गिरा, भागो! और सब जानवर हँसने लगे।
इस कहानी से हम सीखते हैं कि कोई बात सुनते ही डरकर भागना नहीं चाहिए। पहले खुद देखना और जाँचना चाहिए कि बात सच है या नहीं — जैसे शेर ने किया।
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