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जयपुर से पत्र

डाक और पिन कोड

जानो कि डाक से चिट्ठी कैसे पहुँचती है और पिन कोड क्या होता है।

अमर का पत्र जयपुर से उसके घर तक कैसे पहुँचा होगा? आपकी किताब 'वीणा' के पृष्ठ 68 और 74 पर डाक के बारे में बताया गया है।

डाक पेटी लाल रंग की पेटी होती है। जब हमें किसी को चिट्ठी भेजनी होती है, तो हम उस पर सही पता लिखकर उसे डाक पेटी में डाल देते हैं। फिर डाकघर के डाकिया भैया या डाकिया बहना डाक पेटी से चिट्ठियाँ निकालकर डाकघर ले जाते हैं। डाकघर से चिट्ठियाँ उन नगरों के डाकघरों को भेजी जाती हैं जिनका पता उन पर लिखा है। वहाँ से डाकिया उन्हें सही पते पर पहुँचा देते हैं।

पते में पिनकोड भी लिखा जाता है। पिनकोड छह अंकों की एक संख्या होती है। इससे किसी खास क्षेत्र (इलाके) की पहचान होती है, और यह चिट्ठी और पार्सल को सही जगह पहुँचाने में मदद करता है। पिनकोड के आखिरी तीन अंक उस डाकघर की पहचान बताते हैं जहाँ से चिट्ठी बाँटी जाएगी।

पुराने समय में डाक विभाग नहीं था। तब पत्र ले जाने वाले लोग होते थे, जिन्हें दूत कहते थे। कम दूरी के लिए दूत पैदल ही पत्र पहुँचा देते थे। लंबी दूरी के लिए पक्षियों, खासकर कबूतरों से पत्र भेजे जाते थे। बहुत ज़रूरी पत्र के लिए दूत बारी-बारी से दौड़ते थे: एक दूत कुछ दूर दौड़कर पत्र दूसरे दूत को पकड़ा देता था। घुड़सवार दूत भी होते थे, जिन्हें अश्वदूत कहते थे।

भारत में डाक विभाग की स्थापना सन् 1854 में हुई। इसके बाद पूरे देश में डाकघर खोले गए। आज स्पीड पोस्ट जैसी सुविधाएँ भी हैं।

डाक पेटी की चिट्ठियाँ डाकिया डाकघर ले जाते हैं और वहाँ से वे सही पते तक पहुँचती हैं; पिनकोड छह अंकों की संख्या है जो क्षेत्र की पहचान बताती है, और उसके आखिरी तीन अंक डाकघर की पहचान बताते हैं।

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