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नकली हीरे

कहानी का अंत

चित्रकथा 'नकली हीरे' का अंत पढ़ो।

यह आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 7 'नकली हीरे' का आखिरी हिस्सा है। नवयुवक दरबारी ने राजा से सच कहा था: आप बुद्धिमान और ईमानदार हैं, पर आपसे भी श्रेष्ठ राजा हो चुके हैं।

यह सुनकर राजा नाराज़ नहीं हुआ। वह बहुत प्रसन्न हुआ! उसने कहा — हमें आपका उत्तर सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई, यह लो आपका हीरा। और राजा ने नवयुवक को भी एक हीरा दिया।

अगली सुबह काननपुर के सारे दरबारी फिर दरबार में आए। उन्होंने कहा — महाराज, हमने इन हीरों की जाँच जौहरी से करवाई। (जौहरी वह होता है जो हीरे-मोती परखता और बेचता है।) पता चला कि सारे हीरे तो नकली हैं! आपने हमारे साथ ऐसा क्यों किया?

राजा बोला — रुकिए, मैं समझाता हूँ। आप सबने मेरे प्रश्न का झूठा उत्तर दिया, इसलिए आपको हीरे भी नकली दिए गए। पर इस नौजवान ने सीधा-सादा, सच्चा उत्तर दिया, इसलिए इसे असली हीरा दिया गया। और मेरे बाद यही मेरे बेटे का विश्वस्त (भरोसेमंद) सलाहकार रहेगा।

नवयुवक ने सच बोला, पर बड़े आदर से — उसने 'क्षमा कीजिएगा' कहकर अपनी बात रखी। वह एक विनम्र नवयुवक था। वह न झूठ बोलता था, न दिखावा करता था।

कहानी में झूठी तारीफ़ करने वाले दरबारियों को नकली हीरे मिले और सच बोलने वाले विनम्र नवयुवक को असली हीरा — और राजा ने उसे अपने बेटे का विश्वस्त सलाहकार चुना।

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