मिठाइयों का सम्मेलन
मिठाइयों का सम्मेलन
कहानी 'मिठाइयों का सम्मेलन' पढ़ो और बोलने वाली मिठाइयों से मिलो।
यह कहानी आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 9 'मिठाइयों का सम्मेलन' की है। इसमें मिठाइयाँ आपस में बातें करती हैं, जैसे लोग करते हैं। इसे यहाँ छोटे में पढ़ो।
एक शाम छगनलाल हलवाई अपनी दुकान बंद करके घर चले गए। दुकान बंद होते ही भीतर रखी मिठाइयों को मौका मिल गया। उन्होंने मिलकर एक सम्मेलन (सभा) किया। सबसे बड़े लड्डू दादा को अध्यक्ष बनाया गया — यानी सभा को चलाने वाला मुखिया। सुनने वालों में इमरती जी, पेड़ा, बरफ़ी बहन, रसगुल्ला, जलेबी बहन, रबड़ी जी, गुलाबजामुन, मैसूरपाक, रसमलाई, सोनपापड़ी, बालूशाही, कलाकंद भाई, गुझिया, काजूकतली और शक्करपारा बैठे थे।
सबसे पहले कलाकंद भाई ने अपनी चिंता बताई: आजकल डॉक्टर कुछ लोगों को मिठाई खाने से रोक रहे हैं। सोनपापड़ी ने पूछा कि क्या किसी को पता है, डॉक्टर ऐसा क्यों कर रहे हैं? जलेबी बहन ने बरफ़ी बहन से जवाब देने को कहा, तो बरफ़ी बहन बोलीं कि मेरा मज़ाक मत उड़ाओ। तब मैसूरपाक ने दोनों को याद दिलाया कि हमारा स्वाद मीठा है, इसलिए हमें बोल भी मीठे बोलने चाहिए और सबके मन में मिठास फैलानी चाहिए।
फिर रसगुल्ला बोला — असली बात यह है कि हमारी बहुत ज़्यादा मिठास (अति मिठास) ही हमारी उपेक्षा का कारण है। 'उपेक्षा' का मतलब है किसी को अनदेखा करना, उससे दूर रहना। गुलाबजामुन ने कहा कि रसगुल्ला भाई ठीक कह रहे हैं, पर लोगों की चटोरी जीभ मानती ही नहीं — वह और मीठा माँगती है, और लोग मीठा खाते-खाते थकते नहीं।
तब गुझिया ने बताया कि कुछ लोगों के शरीर में शक्कर की मात्रा बढ़ रही है। इसके बाद सभा में यह बात हुई कि अब क्या किया जाए — वह हम अगले पाठ में पढ़ेंगे।
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