मिठाइयों का सम्मेलन
सम्मेलन का फ़ैसला
जानो कि मिठाइयों के सम्मेलन में क्या फ़ैसला हुआ।
आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 9 'मिठाइयों का सम्मेलन' में मिठाइयाँ इस चिंता पर बात कर रही थीं कि लोग उनसे दूर क्यों हो रहे हैं। अब देखो कि सभा ने आखिर क्या फ़ैसला किया।
रबड़ी जी ने एक पुरानी कहावत याद दिलाई: 'जहाँ अति होती है, वहाँ क्षति होती है।' 'अति' का मतलब है ज़रूरत से बहुत ज़्यादा, और 'क्षति' का मतलब है नुकसान। रबड़ी जी बोलीं कि लोग हमें खाते समय अति कर देते हैं — बहुत ज़्यादा खा लेते हैं — और बाद में उसका नुकसान भुगतते हैं।
तब लड्डू दादा ने पहला सुझाव दिया: हमें अपने अंदर शक्कर की मात्रा कम करनी चाहिए। यह सुनकर गुलाबजामुन घबरा गया — अगर हम मीठे ही न रहे, तो फिर हमें मिठाई कौन कहेगा? लड्डू दादा ने समझाया कि शक्कर कम होने से ही हम लोगों के मन में मिठास बढ़ा सकते हैं।
पेड़ा बोला कि खुशी के मौकों पर मिठाई बाँटने की रीत को तो कोई बंद नहीं कर सकता। लड्डू दादा ने कहा — ठीक है, पर लोगों को भी अपनी जीभ पर थोड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। वे मिठाई खाएँ, पर अति न करें। शारीरिक श्रम करते रहें, यानी खेलें, दौड़ें, काम करें, और स्वस्थ रहें। इसी फ़ैसले के साथ लड्डू दादा ने सबको धन्यवाद दिया और सम्मेलन खत्म किया।
इस पाठ की सीख यही है: मिठाई बुरी नहीं है, पर किसी भी चीज़ को ज़रूरत से ज़्यादा लेना नुकसान करता है। किताब के पृष्ठ 113 पर भी यही कहावत है, और वहाँ पूछा गया है कि क्या तुम्हारे पास इसका कोई अनुभव है — जैसे बहुत देर तक मोबाइल देखने से आँखें थक जाना।
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