तीन मछलियाँ
कहानी का अंत और सीख
कहानी का अंत पढ़ो और उसकी सीख समझो।
आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 10 'तीन मछलियाँ' का अंत ऐसे हुआ। सुबह हुई तो सरोवर में रुकी मछलियाँ मना रही थीं कि शायद मछुआरे न आएँ। पर थोड़ी ही देर में मछुआरों की आवाज़ें (ध्वनियाँ) सुनाई दीं। उन्होंने आकर जाल डाला और वहाँ रुकी सब मछलियों को पकड़ लिया। प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य भी जाल में फँस गईं।
मछुआरे बहुत खुश थे कि उन्हें इतनी स्वस्थ और बड़ी-बड़ी मछलियाँ मिल गईं। अब प्रत्युत्पन्नमति तेज़ी से बचने का उपाय सोचने लगी। मछुआरों की बातों से वह समझ गई कि उन्हें केवल स्वस्थ और जीवित मछलियाँ चाहिए।
उसने उसी पल अपना शरीर सिकोड़ लिया और आँखें बंद करके ऐसे पड़ गई, जैसे उसमें जान ही न हो। मछुआरों ने देखा कि एक मछली मरी हुई है, तो उन्होंने उसे जाल से निकालकर सरोवर में फेंक दिया। इस तरह अपनी तुरंत काम करने वाली बुद्धि से प्रत्युत्पन्नमति की जान बच गई।
पर यद्भविष्य नहीं बच सकी। मछुआरे उसे और उसकी साथी मछलियों को लेकर चले गए।
इस कहानी की सीख: भाग्य के भरोसे बैठे रहने से संकट नहीं टलता। पहले से सोचकर तैयारी करना (जैसे अनागतविधाता ने किया), या मुसीबत के समय सूझ-बूझ से काम लेना (जैसे प्रत्युत्पन्नमति ने किया) प्राण बचाता है।
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