गंगा की कहानी
गंगा का प्रदूषण
जानो कि गंगा अपने प्रदूषण के बारे में क्या कहती है।
आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 12 के अंत में गंगा अपने मन की बात कहती है। वह बताती है कि भारतवासी उसे पवित्र नदी मानते हैं।
गंगोत्री से निकलते समय गंगा का रूप चाँदी जैसा चमकीला रहता है — यानी उसका पानी बहुत साफ़ और चमकदार होता है। पर उसे दुख है कि काशी (वाराणसी) पहुँचते-पहुँचते उसका चमकीला रंग मटमैला (मिट्टी जैसा गंदा) हो जाता है।
ऐसा क्यों होता है? गंगा बताती है: कारखानों और शहरों का गंदा पानी उसके जल को दूषित कर देता है। इस गंदे पानी और कचरे को अपशिष्ट भी कहते हैं। पानी का इस तरह गंदा होना जल प्रदूषण कहलाता है।
पर अब गंगा को इस बात की प्रसन्नता है कि लोगों का ध्यान इस ओर गया है — यानी लोगों ने गंगा के प्रदूषण को पहचाना है। उसके जल को शुद्ध करने के प्रयास शुरू हो गए हैं।
गंगा को उस दिन की प्रतीक्षा है, जब उसका जल फिर से वैसा ही स्वच्छ और निर्मल हो जाएगा, जैसा गंगोत्री से निकलते समय रहता है।
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