चाँद का कुरता
झिंगोला क्यों नहीं बना
जानो कि माँ चाँद के लिए झिंगोला क्यों नहीं बना पाईं।
अपनी किताब 'वीणा' का पृष्ठ 23 खोलो और कविता 'चाँद का कुरता' का दूसरा हिस्सा पढ़ो। इसमें चाँद की माँ अपने बेटे को जवाब देती है। तुम्हें याद होगा कि चाँद ने ठंड से बचने के लिए ऊन का मोटा झिंगोला माँगा था।
कविता में माँ मानती है कि जाड़े की बात तो ठीक है — ठंड सचमुच लगती होगी। पर उसे एक डर है, एक चिंता है। वह कहती है कि मैंने तुम्हें कभी एक ही नाप में नहीं देखा। कभी तुम एक अंगुल-भर चौड़े (उँगली जितने पतले) होते हो, तो कभी एक फुट मोटे। किसी दिन बड़े हो जाते हो, तो किसी दिन छोटे।
माँ आगे कहती है कि तुम रोज़ घटते-बढ़ते रहते हो, और किसी दिन तो तुम किसी को नज़र ही नहीं आते। फिर माँ चाँद से ही पूछती है — बताओ, तुम्हारा नाप किस दिन का लिया जाए? उसे तो ऐसा झिंगोला चाहिए जो हर दिन चाँद के शरीर पर ठीक बैठे।
तो माँ झिंगोला इसलिए नहीं सिलवा पा रही कि चाँद का आकार हर दिन बदलता रहता है। कपड़ा सिलने से पहले दर्ज़ी नाप लेता है — पर जिसका नाप रोज़ बदले, उसका कपड़ा कैसे सिले? यही कविता की मज़ेदार बात है। (तुमने भी देखा होगा कि आसमान में चाँद हमें हर रात अलग आकार का दिखाई देता है।)
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