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चाँद का कुरता

कविता: चाँद का कुरता

कविता 'चाँद का कुरता' पढ़ो और ठंड से काँपते चाँद से मिलो।

अपनी किताब 'वीणा' का पृष्ठ 22 खोलो और पाठ 3 की कविता 'चाँद का कुरता' पढ़ो। यह कविता रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखी है। इसमें चाँद एक छोटे बच्चे की तरह अपनी माँ से बात करता है — ठीक वैसे ही, जैसे तुम कभी-कभी अपनी माँ से किसी चीज़ के लिए ज़िद करते हो।

कविता में एक दिन चाँद हठ (ज़िद) करके बैठ जाता है और माँ से कहता है: माँ, मुझे ऊन का एक मोटा झिंगोला सिलवा दो। झिंगोला एक ढीला-ढाला, गरम कुरता होता है। चाँद को इसकी ज़रूरत क्यों है? वह बताता है कि रात भर ठंडी हवा सन-सन करती चलती है, और उसे इतनी सर्दी लगती है मानो वह जाड़े से मरा जा रहा हो।

चाँद हर रात आसमान की यात्रा करता है — आकाश के एक छोर से दूसरे छोर तक। वह बताता है कि ठंड से ठिठुर-ठिठुरकर (काँपते हुए) वह बड़ी मुश्किल से अपना यह सफ़र पूरा कर पाता है। एक तो आसमान का लंबा सफ़र, ऊपर से जाड़े का मौसम!

फिर चाँद माँ से कहता है कि अगर झिंगोला न बन सके, तो कम से कम कोई भाड़े का (किराए का) कुरता ही ला दो। बेटे की बात सुनकर माँ प्यार से उसे 'सलोने' (प्यारे, सुंदर बेटे) कहकर पुकारती है और आशीर्वाद देती है कि भगवान तुम्हें सदा कुशल रखें। पर झिंगोला सिलवाने में माँ को एक बड़ी परेशानी है — वह हम अगले पाठ में पढ़ेंगे।

कविता में चाँद माँ से ऊन का मोटा झिंगोला (या कम से कम भाड़े का कुरता) माँगता है, क्योंकि रात भर ठंडी हवा सन-सन चलती है और जाड़े में आसमान की यात्रा उसे ठिठुर-ठिठुरकर पूरी करनी पड़ती है।

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