सुंदरिया
कहानी का अंत
कहानी 'सुंदरिया' का अंत पढ़ो।
यह कहानी का आखिरी हिस्सा है — आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 5 'सुंदरिया' (पृष्ठ 49-50) से। एक सवेरे ड्योढ़ी में बहुत-सा दूध बिखरा हुआ मिला। उससे पिछली शाम गाय ने घोसी को दूध देने से बिलकुल इनकार कर दिया था।
सेठ ने पूछा — हीरा, यह क्या बात है? हीरासिंह ने सिर झुका लिया, फिर पूछा कि कहीं रात को गाय खुली तो नहीं रह गई थी। घोसी ने कहा कि उसने खुद गाय को खूँटे से बाँधा था। तब हीरासिंह बोला — गाय रात को आकर ड्योढ़ी में खड़ी रही है, और अपना दूध यहीं गिरा गई है। याद करो, ड्योढ़ी पर ही तो हीरासिंह रहता था! यानी गाय रात को उसी के पास आई थी। पर सेठ ने इसे बनावटी बात माना और कहा कि ऐसी बातें औरों से कहना; जाकर पता लगाओ कि यह किस आदमी की करतूत है।
हीरासिंह चुपचाप अपनी कोठरी में जाकर लेट गया, और कब उसे नींद आ गई, पता ही नहीं चला। रात को अचानक दरवाज़े पर कुछ रगड़ने की आवाज़ आई। उसने उठकर दरवाज़ा खोला — सामने सुंदरिया खड़ी थी! वह मुँह ऊपर उठाकर ऐसी आँखों से देख रही थी, जैसे कोई अपराधी हो और क्षमा माँग रहा हो — मानो कह रही हो कि मुझसे गलती हुई, मुझे माफ़ कर दो, मैं बहुत दुखी हूँ।
यह देखकर हीरासिंह भावुक हो उठा। उसके आँसू रुके नहीं; वह सुंदरिया की गर्दन से लिपटकर देर तक सिसकता रहा। अब वह समझ गया था कि सुंदरिया उससे और उसके परिवार से अलग रहकर बहुत दुखी है।
अगले सवेरे उसने सेठ से कहा — आप मुझसे जितने महीने चाहें, कसकर काम करवाइए, पर गाय आज ही गाँव जाएगी। जब आपके रुपए पूरे हो जाएँ, मुझे बता दीजिएगा, तब मैं भी छुट्टी ले लूँगा। और सेठ कुछ कह पाते, उससे पहले ही हीरासिंह सुंदरिया को लेकर चल दिया।
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