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सुंदरिया

सेठ के घर क्या हुआ

जानो कि सेठ के घर जाकर क्या हुआ।

यह हिस्सा आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 5 'सुंदरिया' (पृष्ठ 48-49) से है। हीरासिंह ने रुपए तो ले लिए, पर उसका मन भर आया था। जब घोसी गाय को ले जाने लगा, तो सुंदरिया उसके साथ जाना ही नहीं चाहती थी।

हीरासिंह सुंदरिया से अलग होना सह नहीं पा रहा था। उसने सेठ से कहा — मुझे गाय की देखभाल के काम पर लगा दीजिए, चाहे तनख्वाह कम कर दीजिए। पर सेठ बोले कि तुम्हारे जैसा ईमानदार चौकीदार हमें दूसरा कहाँ मिलेगा? तनख्वाह हम एक रुपया और बढ़ा सकते हैं, पर तुम्हें ड्योढ़ी (घर के बड़े दरवाज़े) पर ही रहना होगा। हीरासिंह क्या करता! उसने सुंदरिया को पुचकारकर जाने को कहा। गाय ने उसकी ओर ऐसे देखा मानो पूछ रही हो — सचमुच इसके साथ चली जाऊँ? फिर वह घोसी के पीछे चली गई, और हीरासिंह उसे एकटक देखता रहा।

अगले दिन गड़बड़ हो गई। सेठ ने हीरासिंह को बुलाकर कहा कि तुमने मुझे धोखा क्यों दिया — सवेरे गाय से पाँच सेर दूध भी नहीं निकला। हीरासिंह ने कहा कि मैंने तो खुद पंद्रह सेर से ज़्यादा दुहकर दिया था। वह गाय के पास गया और प्यार से बोला — सुंदरिया, मेरा अपमान क्यों कराती है? घोसी बोला कि वह तो पहले ही दुह चुका है, पर हीरासिंह ने बालटी मँगाई और साढ़े तेरह सेर दूध दुहकर सेठ के पास भेज दिया।

दूसरे दिन फिर वही हुआ — बहुत कोशिश करने पर भी गाय ने घोसी को पूरा दूध नहीं दिया। सेठ बोले कि यह तो सरासर धोखा है; अपनी गाय ले जाओ और मेरे रुपए लौटाओ। पर हीरासिंह रुपए गाँव भेज चुका था, और उनमें से काफ़ी रुपए मकान की मरम्मत में लग गए थे। उसे चुप देखकर सेठ बोले — अच्छा, रकम तुम्हारी तनख्वाह में से कटती जाएगी; जब पूरी हो जाए, तब अपनी गाय ले जाना।

सुंदरिया घोसी के साथ जाना नहीं चाहती थी और उसे पाँच सेर दूध भी नहीं देती थी, पर हीरासिंह के दुहने पर साढ़े तेरह सेर देती थी; सेठ ने इसे धोखा समझा, और रुपए खर्च हो चुके थे, इसलिए वे हीरासिंह की तनख्वाह से कटने लगे।

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