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सुंदरिया

गाय का सौदा

पढ़ो कि सुंदरिया गाय का सौदा कैसे हुआ।

यह हिस्सा आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 5 'सुंदरिया' (पृष्ठ 46-47) से है। एक दिन सेठ ने हीरासिंह से कहा कि तुम हरियाणा के रहने वाले हो, वहाँ की गायें अच्छी होती हैं — मेरे लिए एक गाय का बंदोबस्त कर दो।

हीरासिंह को सुंदरिया की याद आई। उसने बताया कि उसकी नज़र में एक गाय है, जो दूध देने में कामधेनु है — यानी बहुत दूध देती है। वह पंद्रह सेर दूध देती है, और उसके दो सौ रुपए तक लग चुके हैं। 'सेर' पुराने समय में मापने की एक भारतीय इकाई थी; किताब के पृष्ठ 57 पर भी यही बताया गया है। सेठ बोला — ठीक है, हम पाँच रुपए ज़्यादा दे देंगे।

तब हीरासिंह ने साफ़-साफ़ सच कह दिया कि वह गाय उसकी अपनी ही है। सेठ खुश होकर बोले कि तब तो अच्छी बात है — तुम्हें भी दो सौ पाँच ही मिलेंगे। हीरासिंह को बड़ी लाज आई; वह कैसे समझाए कि सुंदरिया तो उसके परिवार का हिस्सा है! पर उसने सोचा कि सेठ के घर रहेगी तो गाय कम से कम उसकी आँखों के सामने तो रहेगी।

सेठ ने उसी समय सौ रुपए मँगाकर हीरासिंह को दे दिए और पूछा कि कब तक लौटोगे। हीरासिंह ने कहा — पाँच दिन तो लगेंगे ही। वह उसी दिन गाँव गया और जैसे-तैसे जवाहरसिंह को समझा-बुझाकर गाय ले आया।

गाय देखकर सेठ बहुत खुश हुए; ऐसी सुंदर, स्वस्थ गाय उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी। हीरासिंह ने खुद उसे चारा-पानी दिया, सहलाया और अपने हाथों से दुहा — दूध पंद्रह सेर से कुछ ऊपर निकला। तब सेठ ने उसे एक सौ सात रुपए और दिए; सौ रुपए वह पहले ही ले चुका था। फिर सेठ ने घोसी (दूधवाले) को बुलाकर गाय उसे सौंप दी।

सेठ ने हरियाणा की अच्छी गाय माँगी; हीरासिंह ने अपनी गाय सुंदरिया को पंद्रह सेर दूध देने वाली कामधेनु बताया, सच कहा कि गाय उसकी अपनी है, और सेठ ने सौ रुपए पहले और एक सौ सात रुपए गाय आने पर दिए।

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