काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा
काजीरंगा की यात्रा
चाचा अरूप के पत्र के साथ काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा करो।
आपकी किताब 'वीणा' का पाठ 8 'काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा' एक पत्र है। पत्र के ऊपर लिखा है 'प्रिय बच्चो' और नीचे लिखा है 'तुम्हारे चाचा, अरूप'। यानी यह पत्र चाचा अरूप ने बच्चों को लिखा है, ताकि वे बच्चों को अपनी यात्रा का पूरा हाल सुना सकें। किसी यात्रा के बारे में ऐसा लिखना यात्रा-वर्णन कहलाता है।
चाचा अरूप यह पत्र काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान से ही लिख रहे हैं। वे बताते हैं कि काजीरंगा असम में है, ब्रह्मपुत्र नदी के तट (किनारे) पर। वहाँ तरह-तरह के पशु और पक्षी रहते हैं।
पहले दिन वे हाथियों पर बैठकर उद्यान देखने निकले। इसके लिए उन्हें बहुत जल्दी उठना पड़ा — इतनी जल्दी कि तब तक सूरज भी नहीं निकला था! उस सुबह उन्होंने हिरणों और जंगली भैंसों के झुंड देखे, और पहली बार एक सींग वाला गैंडा भी देखा।
पर यह यात्रा बहुत जल्दी खत्म हो गई, और चाचा अरूप का मन अभी भरा नहीं था — वे और देखना चाहते थे। इसलिए अगले दिन सुबह नाश्ता करके वे फिर निकले। इस बार वे जीप में गए, और उनके साथ वन संरक्षक भी था।
पत्र के अंत में चाचा अरूप लिखते हैं कि यह एक अद्भुत अनुभव था। काजीरंगा में अलग-अलग तरह के पशु शांति से साथ-साथ रहते हैं, और हम मनुष्य अपने इन वन-साथियों से बहुत कुछ सीख सकते हैं।
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