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मेरा बचपन

मुरलीकांत पेटकर

भारत के पहले पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता मुरलीकांत पेटकर के बारे में जानो।

पाठ 'मेरा बचपन' के आखिर में, अपनी किताब 'वीणा' के पृष्ठ 84 पर, 'इन्हें भी जानिए' में एक सच्चे खिलाड़ी के बारे में बताया गया है: मुरलीकांत राजाराम पेटकर। वे भारत के एक प्रसिद्ध पैरालंपिक तैराक के रूप में जाने जाते हैं।

पहले समझो कि पैरालंपिक खेल क्या हैं। ये दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए समय-समय पर होने वाला ओलंपिक खेलों का कार्यक्रम है। दिव्यांग यानी वे लोग जिनके शरीर का कोई अंग ठीक से काम नहीं करता, पर जिनकी हिम्मत किसी से कम नहीं होती।

मुरलीकांत पेटकर का जन्म सन् 1944 में महाराष्ट्र में हुआ था। उन्हें बचपन से ही कुश्ती, हॉकी जैसे खेलों में रुचि थी। बड़े होकर वे भारतीय सेना में जवान बने। सन् 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्हें कई गोलियाँ लगीं, और वे लकवाग्रस्त हो गए — यानी उनके शरीर के कुछ अंगों ने काम करना बंद कर दिया।

पर उन्होंने हार नहीं मानी। चिकित्सकों (डॉक्टरों) की सलाह पर उन्होंने तैराकी शुरू की। अपनी लगन और मेहनत से कुछ ही समय में वे तैराकी में माहिर हो गए। सन् 1972 में हाइडिलबर्ग में हुए पैरालंपिक खेलों में उन्होंने भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया।

उनके इस बड़े काम के लिए सन् 2018 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। उनकी कहानी सिखाती है कि लगन और मेहनत से मुश्किल से मुश्किल हालात में भी आगे बढ़ा जा सकता है।

सेना के जवान मुरलीकांत पेटकर 1965 के युद्ध में लकवाग्रस्त हुए, डॉक्टरों की सलाह पर तैराकी सीखी और 1972 के हाइडिलबर्ग पैरालंपिक में भारत को पहला स्वर्ण पदक दिलाया; 2018 में उन्हें पद्म श्री मिला।

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