मेरा बचपन
बिना खर्च के खेल
उन भारतीय खेलों के बारे में जानो जो बिना खर्च के खेले जाते हैं।
पाठ 'मेरा बचपन' में प्रेमचंद कहते हैं कि भारतीय खेल बिना दाम-कौड़ी के खेले जाते हैं — जैसे गुल्ली-डंडा, जिसके लिए बस पेड़ की एक टहनी चाहिए। अपनी किताब 'वीणा' के पृष्ठ 83 पर 'आपके खेल' में ऐसे ही चार और खेल दिए गए हैं। इनमें किसी खास महँगे सामान की ज़रूरत नहीं पड़ती, और जो चाहिए वह बच्चे खुद ही बना लेते हैं।
इकड़ी-दुकड़ी — ज़मीन पर चॉक या लकड़ी से कुछ खाने बनाए जाते हैं, और बच्चे बारी-बारी से उन खानों में कूदते हुए खेलते हैं।
लट्टू — लकड़ी का एक गोल खिलौना, जिसके नीचे नुकीली कील होती है। उस पर डोरी लपेटकर झटके से ज़मीन पर छोड़ते हैं, तो वह तेज़ी से घूमने लगता है।
पतंग — कागज़ और पतली तीलियों से बनी पतंग को डोर के सहारे हवा में ऊँचा उड़ाया जाता है।
कबड्डी — इसमें दो टोलियाँ होती हैं और बीच में एक रेखा। एक टोली का खिलाड़ी साँस रोककर 'कबड्डी-कबड्डी' बोलता हुआ दूसरी टोली के पाले में जाता है, किसी खिलाड़ी को छूता है और पकड़े जाने से पहले अपने पाले में लौटने की कोशिश करता है। इसके लिए बस खुला मैदान और दोस्त चाहिए!
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