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न्याय

नाटक कैसे लिखा जाता है

जानो कि नाटक कैसे लिखा जाता है और विष्णु प्रभाकर का नाटक 'न्याय' शुरू करो।

आपकी किताब 'वीणा' का पाठ 9 'न्याय' एक नाटक है, जिसे विष्णु प्रभाकर ने लिखा है। नाटक कहानी की तरह नहीं लिखा जाता। वह ऐसे लिखा जाता है कि उसे मंच पर खेला जा सके — कुछ बच्चे पात्र बनें और अपने-अपने संवाद (बोलने वाली बातें) बोलें।

नाटक की शुरुआत में एक डिब्बे में 'पात्र परिचय' लिखा है। इसमें बताया गया है कि नाटक में कौन-कौन है: सिद्धार्थ — कपिलवस्तु के राजकुमार; शुद्धोदन — कपिलवस्तु के महाराजा; सखा — सिद्धार्थ का मित्र; देवदत्त — सिद्धार्थ का चचेरा भाई; मंत्री — महाराजा का मंत्री; और प्रतिहारी — जो दरवाज़े पर रहकर आने वालों की खबर महाराज तक पहुँचाता है।

यह नाटक दो हिस्सों में बँटा है, जिन्हें 'दृश्य' कहते हैं। 'पहला दृश्य' राज-उद्यान (राजा के बगीचे) में शाम के समय होता है। 'दूसरा दृश्य' महाराज शुद्धोदन की सभा में होता है।

नाटक में हर संवाद से पहले उस पात्र का नाम लिखा होता है जो बोल रहा है — जैसे 'सिद्धार्थ -' या 'सखा -'। और जो बातें कोष्ठक ( ) में लिखी हैं, वे बोली नहीं जातीं। वे बताती हैं कि मंच पर क्या दिख रहा है, या पात्र कैसे बोल रहा है और क्या कर रहा है — जैसे (हँसकर), (ऊपर देखते हुए), (दोनों जाते हैं। परदा गिरता है।)। इन्हें मंच-निर्देश कहते हैं। हर दृश्य के अंत में परदा गिरता है।

यही सिद्धार्थ आगे चलकर गौतम बुद्ध कहलाए। किताब में भी आगे गौतम बुद्ध से जुड़ी जातक कथाएँ पढ़ने को कहा गया है।

नाटक में शुरू में 'पात्र परिचय' होता है, वह 'दृश्यों' में बँटा होता है, हर संवाद से पहले बोलने वाले पात्र का नाम होता है, और कोष्ठक में लिखी बातें बोली नहीं जातीं — वे मंच-निर्देश हैं।

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