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न्याय

पहला दृश्य

नाटक 'न्याय' का पहला दृश्य पढ़ो।

आपकी किताब 'वीणा' के पाठ 9 'न्याय' नाटक का पहला दृश्य राज-उद्यान में शाम के समय होता है। आकाश में लाली छाई है, फूल झूम रहे हैं, दूर से वन से लौटती गायों की आवाज़ आ रही है और पक्षी गा रहे हैं। कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ अपने सखा (मित्र) के साथ बैठे बातें कर रहे हैं।

सिद्धार्थ कहते हैं — देखो, कितना सुहावना समय है! पक्षी अपने बच्चों से मिलने के लिए लौट रहे हैं, और गायें अपने बछड़ों को प्यार करने के लिए घर लौटने को उतावली हैं। तभी बछड़ों के रँभाने की आवाज़ आती है। सखा पूछता है — बछड़ों को कैसे पता चलता है कि यह उनकी माँओं के लौटने का समय है?

सिद्धार्थ कहते हैं — जब खाने का समय होता है, तो हमें अपने आप भूख लग आती है। सखा जोड़ता है — और सोने के समय नींद भी आ जाती है। सूरज भी रोज़ सुबह पूरब से निकलता है और शाम को पश्चिम में छिप जाता है। सिद्धार्थ कहते हैं — गरमी हर साल एक ही समय पर शुरू होती है, और बारिश भी हर साल तय समय पर होती है। ऐसा लगता है कि हर वस्तु का एक स्वभाव होता है।

तभी ऊपर पंखों की फड़फड़ाहट होती है। आकाश में राजहंस उड़ रहे हैं! सिद्धार्थ कहते हैं कि इनकी आगे निकली गरदन देखो, जैसे ये हवा में तैर रहे हों। सखा मुस्कराकर कहता है — ये तैर ही तो रहे हैं! पानी पर चलना तैरना कहलाता है, और हवा में चलना उड़ना।

पहले दृश्य में सिद्धार्थ और सखा देखते हैं कि हर चीज़ अपने तय समय पर होती है — पक्षी और गायें बच्चों के पास लौटते हैं, भूख और नींद अपने आप आती है, सूरज पूरब से निकलकर पश्चिम में छिपता है — इसलिए सिद्धार्थ कहते हैं कि हर वस्तु का एक स्वभाव होता है।

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